5वीं ईसा पूर्व प्राचीन तेली जाति का इतिहास || Best Teli Jati Ka Itihas

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तेली जाति का इतिहास

अभी तक यह मानते हैं कि सिंधु सभ्यता का काल जो पूर्व वैदिक काल भी कहा जाता है । सेंधव प्रदेश, पुराना पंजाब, जम्मू कश्मीर एवं क्षेत्र में जो मनुष्य निवास करते थे वह मनुष्य त्वचा में रंगो के आधार पर दो भागों में विभाजित थे । श्वेत रंग वाले जो घाटी के विजेता थे – आर्य और जो घाटी की विजेता नहीं थे वे दास कहलाए ।

विद्वान आर्यों को श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि वह युद्ध के विजेता थे । और आर्य मुख्य रूप से पशु पारा के थे जो कालांतर में इन दोनों वर्गों में रक्त सम्मिश्रण हुआ और समाज और बढ़ते गया । उस समय भी दोनों के मध्य युद्ध चलता ही रहता था ।

जिन्होंने अपने आपको पराजित स्वीकार कर ली विजेता जाति की रीति रिवाज और उसकी नीतियों को जिसने अपना ली चतुर्वर्ण अवस्था में शामिल हो गए । और जिन पराजित समूह ने आर्यों की रीति रिवाज और उनकी नीतियों को नहीं अपनाया उन्होंने चतुर वर्ण व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया और उन्हें दास , दस्यु , नित्य , दैत्य , निसाद आदि कहलाये ।

तब तक जातियों का निर्माण नहीं हुआ था और उस समय तक वर्ण व्यवस्था थे और वर्ण व्यवस्था के आधार पर ही लोगों को पहचाना जाता था । और उस समय वर्ण व्यवस्था में परिवर्तन होता था . सूत्रों में उल्लेखित प्रमाणों के आधार पर अनुलोम विवाह से उत्पन्न संतान 7 या 8 पीढ़ी के बाद में अपने मूल वर्ण में लौट सकता था । किंतु प्रतिलोम विवाह करने वालों बनाने के लिए यह सुविधा नहीं थी ।

महाभारत में तुलाधार नामक तत्वदर्शी का उल्लेख मिलता है जो तेल की व्यवसाय करते थे जिसे तेरी ना कह कर वैश्य कहा गया । अर्थात तब तक महाभारत के समय भी तेली जाति का उद्भव नहीं हुआ था । वाल्मीकि की राम कथा के अनुसार तेली जाति का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता है । वैदिक साहित्य में भी तेल पेरने वाले तेली जाति का कोई प्रत्यक्ष प्रसंग वैदिक साहित्य में देखने को नहीं मिलता है । पर्व पुराण के उत्तरखंड में विष्णुगुप्त नामक तेल व्यापारी (तेली जाति का इतिहास | Teli Jati Ka Itihas ) के विद्वानता का उल्लेख मिलता है ।

आर्य सभ्यता के चतुर वर्णीय वय्वस्ता में ब्राम्हण और छत्रिय दोनों के बिच श्रेष्ठता के प्रति स्पर्धा थे । साथ ही वैश्य के ऊपर कृषि , पशुपालन , व्यापार अर्थात कृषि उत्पादन और वितरण का दायित्व और यज्ञ राशि के ऊपर कृषि पशुपालन एवं व्यापार अर्थात कृषि उत्पाद का वितरण का दायित्व था इन पर यज्ञ एवं दान की अनिवार्यता भी लाद दी गई जिससे समाज में अशांति थी .

तथा भगवान महावीर आए जो क्षत्रिय थे । जिन्होंने हत्या का विरोध किया साथ ही जबरदस्ती दान की व्यवस्था का विरोध कर अपनी सिद्धांत प्रतिपादित किया  . इसके बाद शाक्यमुनि गौतम बुद्ध हुए जिन्होंने भगवान महावीर के सिद्धांतों को आगे बढ़ाते हुए वर्णगत, जातिगत लिंगागत का भेदभाव का विरोध किया ।

बुद्ध क्षत्रिय ही थे और उन्हें क्षत्रिय,  वैश्य एवं शुद्र वर्ण का समर्थन मिला। इसी दौरान सिंधु क्षेत्र में यवनों का आक्रमण हुआ और अंत में चंद्रगुप्त मौर्य मगध के शासक बने। इनके वंशज अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया जिसमें 100000 मनुष्य मारे गए तथा डेढ़ लाख मनुष्य घायल हुए। युद्ध के बीच दृश्य को देखकर सम्राट अशोक का दिल परिवर्तन हुआ और बौद्ध धर्म के अनुयाई बन गए । कुछ जैन विद्वान मानते हैं कि सम्राट अशोक जीवन के अंतिम काल में जैन धर्म के अनुयाई हो गए थे । महावीर एवं गौतम बुद्ध के कारण प्रचलित चतुर बनिया व्यवस्था की मात्रा में परिवर्तन हुआ ।

नवीन व्यवस्था में ब्राह्मण के स्थान पर क्षत्रिय श्रेष्ठतम हो गए और ब्राह्मण , वैश्य एवं शुद्ध समांतर पर आ गए । फल स्वरुप वर्ण में परिवर्तन तीव्र हो गया ईसा के 175 वर्ष पूर्व मगध के अंतिम मौर्य राजा वृहद्रत को मारकर उसी के सेनापति पुष्यमित्र शुंग राजा बन गए जो ब्राह्मण थे । माना जाता है कि पुष्यमित्र शुंग के काल में ही किसी पंडित ने मनुस्मृति की रचना की थी शुंग वंश का 150 वर्ष में ही पतन हो जाने से मनुस्मृति का प्रभाव मगध तक हि रहा

इसके प्रथम सदी के प्राप्त शिलालेखों में तैलियों के श्रेणियों संघ गिल्स का उल्लेख मिलता है, महान गुप्त वंश का उदय हुआ जिसमें लगभग 500 वर्षों तक संपूर्ण भारत को अधिपत्य में रखा । इतिहासकारों ने गुप्त वंश को वैश्य वर्ण का माना है ।  राजा समुद्रगुप्त एवं हर्षवर्धन के काल को साहित्य एवं कला के विकास के लिए स्वर्ण युग कहा जाता है . गुप्त काल में पुराणों एवं स्मृतियों की रचना प्रारंभ हुए गुप्त वंश के राजा बालादेव गुप्त के काल में नालंदा विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर भव्य स्तूप का निर्माण हुआ

तेली सब्द का प्रथम प्रयोग (Teli Jati Ka Itihas )

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने स्तूप के निर्माता बालआदित्य को तेलाधक वंश का बताया है।  इतिहासकारों विनी एवं जेम्स ने गुप्त वंश को तेली होने का संकेत किया है । इसी के आधार पर उत्तर भारत का तेली समाज (तेली जाति का इतिहास || Teli Jati Ka Itihas ) गुप्त वंश मानते हुए अपने भगवा ध्वज में गुप्तों के राज्य ने गरुड़ को स्थापित कर लिया . गुप्त काल में सनातन , बौद्ध एवं जैन धर्मावलंबियों को समान दर्जा प्राप्त था।

इसी काल में 05 वीं सदी में अनेसा पर अधिक जोर देते हुए हल चलाने तथा तेल पेरने को हिंसक कार्रवाई माना जाने लगा जिससे वैश्य वर्ण में विभाजन प्रारंभ हुआ। थल चलाकर तिलहन उत्पन्न करने वाले तेली जाति (तेली जाति का इतिहास || Teli Jati Ka Itihas ) को स्मृतिकारों ने शुद्र वर्ण कहा।

इतना ही नहीं तिलहन के दाने में जीव होने तथा तेल पेरने को भी हिंसक कार्यवाही कहा गया गुजरात,  महाराष्ट्र , राजस्थान का क्षेत्र जहां सर्वाधिक तेल उत्पादन होता था घांची के नाम से जाना जाता था .  जैन मुनियों के चतुरमास काल में घानी उद्योग को बंद रखने दबाव बनाया गया फल स्वरुप तलियो एवं शासकों के मध्य संघर्ष हुआ ।

जिन तलियों ने घांची उद्योग को बचाने तलवार उठाया में घांची क्षत्रिय कहलाए। जिन्होंने केवल तेल का व्यवसाय किया वे तेली वैश्य तथा जिन्होंने सुगंधित तेल का व्यापार किया वे मोर बनिया कहलाये । 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पूर्वज मोर बनिया थे जिन्होंने हल चलाकर तिलहन उत्पादन किया उन्हें स्मृति कारों ने शुद्र वर्ण कहा और प्रतिलोम विवाह का किस्सा पकड़ा दिया ।

तेली जाति की उत्पत्ति का प्रमाण 

तेली जाति (तेली जाति का इतिहास || Teli Jati Ka Itihas ) की उत्पत्ति का वर्णन विष्णु धर्मसूत्र , मेघानस मात्रसूत्र , संख एवं सुमंतु में है । एकादश वैश्य ,  मूल वैश्य, पशुपालक , थैलिक कपासमारा , पुष्पकर , स्वर्णकार , कुम्भकार , बढाई , लोहार , दरजी , चर्मकार , ये मूलतः कार्य आधारित वैश्य है । 

तैलिक talkam (sahu teli samaj) कालांतर में आर्थिक दृष्टि से संपन्न हुए। इस तारतम्य में यह कथन अधिक उपयुक्त होगा कि तेल एवं तेल व्यवसाई के असाधारण महत्व को देखकर उच्च वर्गों ने व्यवहार कूटनीति अपनाएं और तैलिक समाज को परेशान एवं नुकसान पहुंचाए . फिर भी तैलिक समाज ने अपने अस्तित्व रक्षा सहन किया और अवसर मिलने पर अपना सामर्थ भी प्रदर्शित किया ।

वास्तव में नौवीं से 13 फ़ीसदी तक तैलिक समाज अपने व्यापार धर्म , सामाजिक रचनात्मक कार्यों के लिए आगे रहे हैं । बुंदेलखंड , बघेलखंड और राजस्थान , गुजरात के क्षेत्रों तैलिक समाज अधिक प्रभावित रहा  ।

मुगल बादशाह शाहजहां तैलिक (तेली जाति का इतिहास || Teli Jati Ka Itihas ) व्यापारी शाहजहां तेली व्यापारी माशा से प्रभावित होकर महूशा का सिक्का चलाने का एकाधिकार दिया । वीर जुझारू और तेलिगन छत्रसाल कवियत्री खगानीय , वीरांगना तेलिन , महारानी स्वर्णमई देवी का उल्लेख सर्वाधिक गौरव की समृद्धि है .

चदबरदाई एवं आल्हा खंड में सेनानी धनीवा धुंवा तेली का उल्लेख मिलता है  । तब धन्वा तेली गरजा – तुमको कोल्हू दिए आदि भी उलेखनीय है । महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध संत तुकाराम के अभंग भक्ति गीत को भाषा अलंकरण संता जी जगनाइ तेलिक वंसज ने किया था । उनकी अभंग गाथा भी धरोहर है । इस प्रसंग में  छत्तीसगढ़ के गौरव स्मृति भी अतिआवश्यक है । राजिम का भक्तिन माता कर्मा एवं महान राजीव लोचन प्रतिमा , सती तेलिन घाटी माता भानेस्वरी देवी की यशोक्ति के साथ  , वर्तमान में भी सतत तपस्या बाबा नारायण स्मरणीय है।

तेली समाज के ऐतिहासिक पवित्र स्थल 

ऐतिहासिक एवं वर्तमान में भी स्थिति प्राय अखिल भारतीय स्थल विशेष का नामांकन समीचीन होगा। काठमांडू नेपाल दैलेख व्यापारी केंद्र चेंबर आफ कामर्स नालंदा विशाल प्रवेश द्वारा स्थापित झांसी कर्मा माता की जन्म भूमि , मथुरा तेली धानी द्वारा निर्मित रंगनाथ मंदिर ,  राजस्थान दानवीर भामाशाह की जन्मभूमि  , ग्वालियर प्राचीन तेली मंदिर ,  परना तेल्या भंडार स्थापित , गोरखपुर गुरु गोरखनाथ की कर्मभूमि , कल्याण संता जी महाराज , करनाल ताई तेलिन की कर्मभूमि , मदुरई सटी कंगी कर्मभूमि ,  राजिम माता कर्मा का भक्ति क्षेत्र, केशकाल सती तेलिन घाटी मंदिर , पुरी माता कर्मा की तपोभूमि शिर्डी आदि ।

यह भी प्रेक्छनीय है की सताब्दी वर्ष पहले सन् 1912 में बनारस में अखिल भारतीय तैलिक साहू महासभा का गठन हुआ । इसी प्रकार से सन 1912 से 1926 तक के धमतरी गोकुलपुरा बगीचा , सिलहट बगीचा , आमदी भाठा में विशाल सम्मेलन संपन्न हुआ । सन 1975 में अखिल भारतीय स्तर पर सर्वप्रथम आयोजित सभी समाज के लिए प्रेरणादाई रचनात्मक संस्कार आदर्श सामूहिक विवाह महासमुंद के मुंगासेर गांव में संपन्न हुआ ।  अब छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश में कन्यादान योजना के अंतर्गत यह शासकीय उपक्रम भी है ।

दुर्ग से सन 1960 में प्रकाशित साहू संदेश पत्रिका अंचल की प्रथम सामाजिक पत्रिका है और वही साहू संपर्क रायपुर से निरंतर प्रकाशित मासिक पत्रिका है। तेलिक (तेली जाति का इतिहास || Teli Jati Ka Itihas) जाति  सामाजिक और गौरववादी को एकीकृत करके सब साहू वैश्य जाति (sahu teli samaj) का इतिहास लेखक सुखदेव सरज समाज गौरव प्रकाशन द्वारा शताब्दी वर्ष 2013 में प्रकाशित सन्दर्भ साहित्य है .

भारत में अंग्रेजों के आगमन से पूर्व तेली समुदाय की स्थिति

इस तारतम्य बताना अधिक सामयिक होगा कि भारत में अंग्रेजों के आगमन से पूर्व तेली समुदाय की स्थिति रहे :-
1 .  वे आर्थिक दृष्टि से प्रभावशाली थे ,
2 .  राजस्थान , बिहार , बंगाल एवं तमिलनाडु में अधिक समृद्धि थे ,
3 . शेष भारत मध्य प्रदेश,  महाराष्ट्र, गुजरात ,छत्तीसगढ़ केरल आदि में बड़े जमींदार एवं साहूकारी के कारोबारी थे ,
4 . वे जंहा भी प्रभावी रहे मंदिर , धर्मशाला आदि निर्माणकर्ता बने ,
5 . दक्षिण में व्यापार उत्तर पूर्व मध्य में राजनीति , पश्चिम में रचनात्मक कार्य में सक्रिय रहे ।

भारत में तेलिओ की आबादी 

भारत में बिहार बंगाल , छत्तीसगढ़ , झारखंड राजिस्थान , आंध्रप्रदेश एवं केरल में तलिक (तेली जाति का इतिहास || Teli Jati Ka Itihas ) आबादी तुलनात्माक अधिक है । तैलिक जाति जन भारत अन्य अन्य नमो से जाने जाते है जैसे  रजिष्ठं में तेली को – घानिक , लाठेचा , राठोड (राठौर तेली गोत्र) , घांची , पद्मसाली आदि , बिहार, बंगाल में साह , साहा , छत्तीसगढ़ , झारखंड मध्यप्रदेश , ओडिसा साहू साव ,  गुजरात में मोर भाई  , दक्षिण प्रांतों में चैती , चैटियर और महाराष्ट्र में तराने के नाम से तेली (sahu teli samaj) को जाने जाते थे ।

सारांश – (तेली जाति का इतिहास || Teli Jati Ka Itihas )

तेली जाति का इतिहास || Teli Jati Ka Itihas
तेली जाति का इतिहास || Teli Jati Ka Itihas

सारांश – में यह कहा जा सकता है कि लगभग 1000 वर्ष पूर्व तक तेली समाज क्षत्रिय , वैश्य एवं शुद्र वर्ण को धारण कर समृद्ध जीवन जी रहे थे। नौवीं दसवीं सदी में गुरु गोरखनाथ हुए . जो चतुर वर्णीय व्यवस्था को नहीं मानने वालों को संगठित कर नया नाथ संप्रदाय के गुरु गोरखनाथ को तेली अपना पूर्वज मानते हैं। 10 वीं 11 वीं सदी में कलचुरी एवं चालुक्य वंश के शासक हुए  . कलचुरी राजा गांगेय देव एवं चालुक्य राजा टेल्को तेली समाज अपना पूर्वज (तेली वंश) (sahu teli samaj) मानता है और भक्त कर्मा माता के प्रसंग को इन राजाओं के काल से संबद्ध करता है।

14वीं सदी में अलवर के नमक व्यापारी हेमचंद्र जो दोसर गोत्र के थे अपने पुरुषार्थ से दिल्ली के शासक बने और मुगल बादशाह अकबर के आक्रमण का सामना किए ।  राजा हेमचंद्र विक्रमादित्य की उपाधि कारण किया था इसलिए इतिहास ने सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के नाम से स्मरण करता है।

16 वीं सदी में राजपूताना में महाराणा प्रताप के मंत्री एवं श्रेष्ठ भामाशाह हुए जो ओसवाल गोत्र के थे ।  जिन्होंने स्वराज के लिए अपनी संपूर्ण संपत्ति को दान कर दिया था । इन्हे ही हम दानवीर भामाशाह के नाम से पुण्य स्मरण करते हैं ।

15 वीं सदी में धार्मिक भेदभाव एवं उन्माद के बीच संत कबीर का जन्म हुआ। इनके शिष्य धनी धर्मदास और जुड़ावन साहू बांधवगढ़ के कसौधन गोत्र थे जिन्होंने अपनी 57 करोड़ की संपत्ति को दान कर छत्तीसगढ़ के दामाखेड़ा, कुदुरमल, कवर्धा,  रतनपुर में संत कबीर के गुरु गद्दी  की स्थापना किए थे।

मुगल काल में तेली समाज (sahu teli samaj) में नाथ संप्रदाय एवं संत कबीर का व्यापक प्रभाव था इसलिए संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में तेली सहित 6 जातियों को चतुर्वर्णीय धर्म को नहीं मानने वाला कहा है । यद्पि राष्ट्रीय व्यवस्था का राष्ट्रीय जीवन में कोई महत्व नहीं रह गया है फिर भी भारतवर्ष का तेली समाज (sahu teli samaj) क्षत्रिय , वैश्य एवं शुद्र वर्ण के साथ-साथ निर्गुणी संप्रदाय के सब व्यवस्था का संदेशवाहक बना हुआ है ।

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