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TOP 20 Chhattisgarhi Kavita | छत्तीसगढ़ी कविता | CG Kavita

जय जोहर संगवारी आप सबो मन ला हमर ब्लॉग पोस्ट में स्वागत करत हो । आज हम आप लोगो को छत्तीसगढ़ के 20 Chhattisgarhi Kavita को जानने वाले है । संगवारी हो ये जितने भी छत्तीसगढ़ी कविता लिखा है वह छतीसगाह के युवाओ को काफी प्रेरित करेगा । ये जितने भी छत्तीसगढ़ी कविता है वह बहुत ही सुन्दर है ।

नवा-नवा सोच विचार हे तेहा लोगन तक जाना चाही । अउ नवा नवा हमर माटी के सुगंध हे , माटी के मर्म हे तेन हा हर मनखे के हृदय में बसना चाही , हमर माटी के सम्मान करना चाही। आपमन बर हमन हा आप सबो झन बर Chhattisgarhi Kavita || छत्तीसगढ़ी कविता ला लथान । तो चला संगी माटी के गोठ ला , माटी , अपन संस्कृति के बात ला हमन हा कविता (CG Kavita) के रूप दे हाँ तो चला बिना किसी देरी के ये कविता (CG Kavita)मन ला पढथन :-

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1. TOP 20 Chhattisgarhi Kavita सभी कविताए

TOP 20 Chhattisgarhi Kavita सभी कविताए 

1 . मोर छत्तीसगढ़ (Chhattisgarhi Kavita)

हमर भाखा हमर बोली
गुरतुर हमर बोली

हमर छत्तीसगढ़ महतारी के
इहु एक चिन्हारी

नी झांको में यती ओती
देखते एके कोती

जेटी मोर जिनगानी हे
तोर भुइया के खाय हन

चाउर अउ दर ओ
अउ सब्बो झन पिए पानी हे

आनी बानी के भाजी भाठा
अलकरहा हे अम्मट जिमि कांदा

पटल झोझो के बात का कान्हो
तीखुर के अपन कहानी हे

बड़े बिहनिया दाई बबा
जाते खेत कमाए बर

मंझनिया के डोकरी दाई के बासी
गोंदली सन मा मिठाये हे

ठेठरी,  खुरमी , चीला , फरा
अरसा , बरी अउ नुचरा यही तोर अभिमान हे

हरियर हरियर खेत खार हे
हरियर हे बन अउ भांठा

चारो कोती फैले हे श्री राम चंद्र जी के गाथा हे

सरगुजा ले बस्तर ला ले ल
की रैगढ़ ले रइपुर

कोन्हो डहर ते चल दे संगी
हमर रंग रंग के चिन्हारी हे

लाज नई लागे मोला छत्तीसगढ़िया कहलाये बर
तोर माटी में बेस हे जीवरा अउ प्राण मोर

मई छत्तीसगढ़ के लइका हरो एकर मोला अभिमान हे
दाई मोला तोर जोहर हे ।।


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2 . मनखे-मनखे एक समान (Chhattisgarhi Kavita)

जय सतनाम दोस्तों सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध , संघर्ष , सद्भावना का सन्देश देने वाले सतनाम पंत के संस्थापक बाबा गुरुघासीदास जी की इस कविता पर आधरित कविता है
सात वचन सतनाम के ,
सादा झंडा सतनाम के

सत के रद्दा सत के पहचान हे
न कोई ढोंग न कोई पाखंड

भाई चारा दया प्रेम करुणा समाय
सब्बो मानव के एक जात बताये

बाबा जी के वाणी हे महान
मनखे मनखे एक समान

न जात न पात
न छोटे बड़े के बात

मानव धर्म के एके धर्म हे संगी सतनाम
मनखे मनखे एक समान

अहिंसा के सन्देश दे
जिव जंतु पशु पक्छी मानव सबला एक बातये हे

सोन चंडी धुर बराबर
सुंदरता धन बल भी असहाय

मन वचन कर्म सन
सच के रद्दा संगी
मानव के आभूसन कहलाये

छल कपट बैर त्याग
मानवतावादी सिध्दांत
समाज ला नया दिशा बताये

बाबा जी के वाणी हे महान
मनखे मनखे एक समान

व्यसन मदिरा ला त्याग
सादा भोजन सतलोक बराबर

स्त्री सम्मान के उपदेश
बराबर बराबर के उपदेश बताये

छुआ छूट के भावना से परे
इंसानियत के पाठ पढ़ाये

बाबा जी के वाणी हे महान
मनखे मनखे एक समान

न कोई तीरथ न कोई धाम
माँ बाप के चरण में हे संगी जग संसार

बाबा जी के वाणी हे महान
मनखे मनखे एक समान

सतनाम हे सार
होव भाव जल पार

सब्बो धर्म के मूल
हे संगी सतनाम

सतनाम सन्देश देवइया ला
हमर सत सत प्रणाम

बाबा जी के वाणी हे महान
मनखे मनखे के समान ।।


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3 . हमर छत्तीसगढ़ सुग्घर (Chhattisgarhi Kavita)

इहा के बोली सुग्घर हंसी अउ ठिठोली सुग्घर
रंग के होली सुग्घर , दिवाली के रंगोली सुग्गर

हमर भुइया अड़बड़ सुग्घर
हमर छत्तीसगढ़ सुघ्घर

इंहा के हरियाकि सुग्घर , धान के सोनहा बाली सुग्घर
आमा के दारी सुग्घर , सोन चिड़िया के लाली सुग्घर

हमर भुइया अड़बड़ सुग्घर
हमर छत्तीसगढ़ सुघ्घर

बस्तर के दसहरा सुग्घर , चाउर के फरा सुग्घर
खेत के बटरा सुग्घर , उरिद दार के बरा सुग्घर

हमर भुइया अड़बड़ सुग्घर
हमर छत्तीसगढ़ सुघ्घर

महानदी के पानी सुग्घर , गंगा प्रसाद के मितानी सुग्घर
बारी के पलारी सुग्घर , हमर राजधानी सुग्घर

हमर भुइया अड़बड़ सुग्घर
हमर छत्तीसगढ़ सुघ्घर

कर्मा अउ ददरिया सुग्घर , सजे धजे नचकरिया सुग्घर
नागर धरे नगरीय सुग्घर , नदिया नरवा अउ तरिया सुग्घर

हमर भुइया अड़बड़ सुग्घर
हमर छत्तीसगढ़ सुघ्घर

लाइ अउ बताशा सुग्घर ,
गम्मत के तमाशा सुग्घर

हमर भुइया अड़बड़ सुग्घर
हमर छत्तीसगढ़ सुघ्घर .. ||


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4 . एक जात इंसान (Chhattisgarhi Kavita)

खुद क खुदा खुद ही भक्त बन
बन न सका वो इंसान

खुद के फैसले खुद के बटवारे
दिलो में बन गई दिवार

जाति को जाति से लड़ाती
धर्म को धर्म से

इस जाति धर्म के चक्कर में
बिखर गई इक जात 

कभी नाम देखते , कभी पहचान देखते
कभी मजहब , कभी जात देखते

खुद को बिरादरी में बाट के
वो अपनी औकात देखते

इस जाति धर्म के चक्क्र में
बिखर गई इक जात

ये तेरा धर्म वो उसकी जात
ये तेरे मेरे खेल पीस गया बेचारा इंसान

न तेरा पता न मेरा पता
किसने बनाई है ये जात ?

साथ हसना साथ रोना
इक है जज्बात

खुद क खुदा खुद ही भक्त बन
बन न सका वो इंसान ।।


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5 . सियान (Chhattisgarhi Kavita)

सियान बिना ध्यान नई आये
ऐसे जम्मो कहिथे गा

ये बात गलत नोहे संगी
बात सोला आना आये गा

सियान है घर के जड़ होते
परिवार ला बांध के रखते गा

परिवार म आंच आय के पहली
आंच ला खुद सहिथे गा

सियान के होय ले लइका मन हा
बेफिकर होक रहिथे गा

एकर बताये रद्दा में चल के
जिनगी मा खुशाली आते गा

घर इक बगिया होथे
सियान होथे बगिया गा

सब्बो ल इक भाव ले
करते वो रखवाली गा

कइसे करो बखान एकर
नई हे एकर पार गा

यही ब्रम्हा , विष्णु,  शिव हे संगी
यही मथुरा , काशी , धाम गा ।।


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6 . हाथी दादा (Chhattisgarhi Kavita)

हाथी दादा हाथी दादा तै कहाँ ले आये हस
पीठ में पैंथर के कथे डाहन खुमाथस

हमरो जगह आओ न , पीठ में बैठाओ न
उत्तर , दक्षिण , पूरब , पश्चिम हमरो ला घुमाओ न

हाथी दादा आओ न हाथी दादा आओ न ।।

दूध दही खाओ खाओ
बुढ़िया कहे रहा लाठी ले के जाओ

बिल्वा कहे ले दादी , चांदी के कटोरा ले
बुढ़िया कहे ले नाती दूध बसी खाय ले

बिल्वा खाय चट ले , भाग देकर फट ले
बुढ़िया कहे लबरा
बिल्वा ओले चुप रा ।।


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7 . मोर माटी महतरी (Chhattisgarhi Kavita)

मोर माटी महतारीं कइसे मई फुलाओ ओला वो
अउ तोर कोरा में बइठे तोरे गुण ला गावो वो

सुरुज उवे उगती ले , लाली ले छाय
अउ हरियर तोर लुगरा कस , बन डोगरी भाय

मन मोर नाचत हे ख़ुशी मई मनावव वो
माटी मोर महतारीं कइसे मई मनावव वो

सरग ले बड़के लागे अंगना तोर दुवारी
महानदी अरपा पैरी धार भौहवे भारी भारी

मोर गंगा जमुना अउ तर जावव वो
मोर माटी महतारीं कइसे मई भुलावव वो

एकर कोख में भरे हे सोना चांदी हीरा मोती
अउ सबो झन के बोझा बोहे सही दुःख पीरा

पसीना के चुचवाके कर्म फूल उपजावव वो
मोर माटी महतारीं कइसे मई भुलावव वो ।।


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8 . आज फेर गांव के याद आवत हे (Chhattisgarhi Kavita)

वो गांव के हरियाली , सुग्घर दिन रात
वो तरिया खाल्हे मंदिर मा
फेर कोन्हो घंटी बजावत हे
आज फेर गांव के याद आवत हे

आज फेर मन के बारी मा
मयूर है डेना अपन बगरावत हे
आज फेर गांव के याद आवत हे

दाई के चिल्लाई वो स्कूल के टाई
गला में आज जनावत हे
आज फेर गांव के याद आवत हे

संगी साथी के हसी ठिठोली वो घूमना फिरना
घडी के कांटा ला फेर फीछू घुमावत हे
आज फेर गांव के याद आवत हे

वो देवारी के दिया , गौरा गौरी चौक के डेरा
राउत के नाचा , सुवा के गीत
वो सुखावट फटका घाम के बेरा
हाथ के सिरसिरि , मने मन सुरसुरावत हे
आज फेर गांव के याद आवत हे

सोचत हव चल देव गांव फिर
बंधे मज़बूरी के आशा , जिनगी के पासा
चिल्लर मन हा खीसा में अड़बड़ सोर मचावत हे
आज फेर गांव के याद आवत हे ।।


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9 . मया स्कूल के (छत्तीसगढ़ी कविता)

आज सुरता आगे भूल से वो मया स्कूल के

सुग्घर चेहरा ला ओकर लुका लुका के देखना
सब्बे पढ़े लिखई ओखरे नजर मा करना

आज सुरता आगे भूल से वो मया स्कूल के

ओखर नानकुन हसी मा , मोर मन मन हा हासय
जब पेन मागे मोर ले , ता देवत हाथ कापय

सब सुरता हा आज आँखि मा झुलगे
आज सुरता आगे भूल से वो मया स्कूल के

वो प्राथना में रहे लीन अउ मोर एक आँखि के सींग
मन ला भावे आँखि के काजर

नादान पन के बारिस सन बादल
आज हिरदय में रानी झूमगे
आज सुरता आगे भूल से वो मया स्कूल के

वो गणित के होसियार , अउ मई इतिहास गड़ो मन मा
बैठव पासू मा पालथी मार
ता देखतिस लहुट के एको बार करे हिरदय धूक्ले
आज सुरता आगे भूल से वो मया स्कूल के

वो सीरतो के मया मा न लालच न जीत
हिरदय के मन भर रहे साँस से साँस के रीत

जुन्ना आँखि मा धुलगे
आज सुरता आगे भूल से वो मया स्कूल के


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10 . जुन्ना माटी के नवा फसल (छत्तीसगढ़ी कविता)

वो रखे कोठी के बिजहा धान
आज हेर देव बने बर किसान

जोतन दार बंदु धरे हो हल
जुन्ना माटी के नवा फसल

मुठा मुठा में मया के बल भर
चिचव धान माटी में मन भर

आकाश बरसाय देख जल
जुन्ना माटी के नवा फसल

थरहा के हवे हरियर रंग
पुरवाही डोले संगे संग

देख के हिरदय जावे मचल
जुन्ना माटी के नवा फसल

नवा हे किसनहा नवा हे मन
नवा हे जांगर नवा परन

थकासी लग आहु कल
जुन्ना माटी के नवा फसल

11 . आवव नवा छत्तीसगढ़ गढथन (छत्तीसगढ़ी कविता)

के बिहनिया के अंजोर मा
सुग्घर भाखा तोर मोर
आवव मया के बाटी बरथन
अउ छत्तीसगहर गढथन

नवा जोश युवा सुरता मा
नवा धोती कुर्ता मा
आवव जबल गोहार करथन
आवव नवा छत्तीसगढ़ गढथन

कौशल राज के चिन्हारी
पुरोधा के गोतियारी ला
आवव अंतस मा सहेजथन
आवव नवा छत्तीसगढ़ गढथन

लहू जे सींचे पग पग मा
बसे करम धरम ला
ओकर नव चिन्हारी करथन
आवव नवा छत्तीसगढ़ गढथन

नवा बस्ता नवा सिलेच मा
नवा स्याही , नवा लेख मा
नवा कागज मा नवा अंजोर भरथन
आवव नवा छत्तीसगढ़ गढथन

मितानी मित मितान मा
पगा बंधे सब संघरथन
आवव नवा छत्तीसगढ़ गढथन

12 . पापा तोर परछाई मा जान हे (छत्तीसगढ़ी कविता)

लुका के रखथन तै मया
पापा तोर मया अब्बड़ हे

जिनगी के सुख सबो देथस
करके दुःख ल अध्धार तै

तोर क़ुरबानी के किस्सा महान हे
पापा तोर परछाई मा जान हे

मुड़ी मा तोर इज्जत के पगा
हसत रहितस तै दिन रात

फेर जानत हव कतेक हे लागा
पापा तोर सहनशीलता अपार हे
पापा तोर परछाई मा जान हे

मै भोरहा के मया म आ जाथव
तोर आँखि मा आंसू ला देखथव

माफ़ कर देबे तोर ये लइका नादान हे
पापा तोर परछाई मा जान हे

मै हर बर गवा जाथव
तोर हाथ ला छोड़ के

मै हर बार सिरा जथो
तोर संग ला छोड़ के

तोर संघरा मा जिनगी , गौरवमान हे
पापा तोर परछाई मा जान हे

मोला तोर संग चलना हे
मै बिकराव झन जिनगी मा
तोला मोर संग रहना हे

मोर जिनगी के पहिया तोर कर्जवान हे
पापा तोर परछाई मा जान हे

तोर हर एक मुस्काई
मोर हिरदय के सिंगार हे
पापा तोर परछाई मा जान हे ।।


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13 . तीजा पोरा (छत्तीसगढ़ी कविता)

पीला रंग में बइला सुग्घर रंगे
गांव खोर मा सियान करत के विचार

दीदी बहिनी जोहत हे रद्दा कपार धरे
चुकिया जांता पोरा पारत गोहार
पनियर होंगे एसो के तीजा पोरा तिहार

पउर के लुगरा रा रखे पोटार
तीजा के परब ला तमड़ डरे

सुरता में बंधे आँखि निहार
पनियर होंगे एसो के तीजा पोरा तिहार

भांचा भांची मने मा विचार
कोरोना तोर मुर्दा निकले

डोकरी पारत हे गोहार
पनियर होंगे एसो के तीजा पोरा तिहार

रोटी पीठा खीर ला खाय हे
बरी के करेला हा मुड़ी ला नवाय हे

कुर्मी ठेठरी मने में रिसा हे
नई भात हे सुन्ना अंगना के सार
पनियर होंगे एसो के तीजा पोरा तिहार


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14 . दस पैसा के स्याही (Chhattisgarhi Kavita)

दस पैसा के स्याही भरावन
पांच पैसा म बत्ती
खम्भा खम्भा घोस घोस के
कर दें ओला चोखी

बोरी के बस्ता सिलावन
बोरी ला बनाथन छाता
बैठे बर बोरी ले जाथन
बेच कान्हा ले पाता

दस पैसा के स्याही भरावन
पांच पैसा म बत्ती

गुरूजी के जब पढ़े चमाटी
विद्या झम झम आवै
दाई ददा के चले कुटाई
टिवसन कोन पढ़ावे

दस पैसा के स्याही भरावन
पांच पैसा म बत्ती

डेढ़ बजे तक भात खा ले
स्कूल जाय बर बासी
चाउमीन चोचला छोड़ दे बाबू
रोटी रहे उपासी

दस पैसा के स्याही भरावन
पांच पैसा म बत्ती

बेरा बर ओरछा छाँव देखन
छुट्टी बर देखन खईखा
टीवी मोबाईल कान्हा जी संगी
खेलन खेलन लइका लइका ।

दस पैसा के स्याही भरावन
पांच पैसा म बत्ती

का नरवा का खेत-खार
का ठंडा का ताल
मजे मजा म रहे जमा झन
अब तइहा होंगे बात

दस पैसा म स्याही भरावन
पांच पैसा म बत्ती


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15 . छत्तीसगढ़ के बासी (Chhattisgarhi Kavita)

गजब मिठाथे रे संगी
मोर छत्तीसगढ़ के बासी
इहि हमर बर तीरथ गंगा
इहि हमर बर कांशी

उठथन बिहनिया करथन मुखारी
अउ झडकथन बासी
दिन भर करथन काम बुता
तभो ले पेट नई होय खाली

गजब मिठाथे रे संगी
मोर छत्तीसगढ़ के बासी

दार दलहन के काम नई हे
नई लागय साग तरकारी
दही महि संग नूं मिर्चा
गोंदली एकर संगवारी 

गजब मिठाथे रे संगी
मोर छत्तीसगढ़ के बासी

के दिन ले बनाबो माल पुआ
के दिन ले बनाबो तसमई पूरी
कतका ला बिसाबो सेव डालिया
के दिन ले खाबो सोंहारी

गजब मिठाथे रे संगी
मोर छत्तीसगढ़ के बासी

समोसा , जलेबी , पोहा , खोआ
रस गुल्ला नई मिठाये
नई खान सकन होटल के रोज
तेलहा फुलहा भजिया 

गजब मिठाथे रे संगी
मोर छत्तीसगढ़ के बासी

सहरिया मन के नक़ल करबो
हो जाहि जग हासी
सेबल सस्ता सबले बढ़िया
मोर छत्तीसग़ के बासी
गजब मिठावे रे संगी
मोर छत्तीसगढ़ के बासी ।।


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16 . जवानी भुलागे गुटखा मा (Chhattisgarhi Kavita)

दारू अउ नशा ह जब  इन्हे ले बंद हो जाहि
तभे गांव के लइका मन विवेकानंद बन पाहि

जवानी आज भुलागे हे गुटका अउ खैनी मा
देश कैसे चढ़ पाहि विकास के निसानी मा

जब गावे ह गोकुल अउ ददा है नन्द हो जाहि
तभे गांव के लइका मन विवेकानंद बन पाहि

भ्रस्टाचार समा गेहे , जवानी के गगरी मा
तभे लइका चले जाथे , आतंक के पैडगरी मा

देशभक्त हो जाए तो परमानन्द हो जाहि
तभे गांव के लइका मन विवेकानंद बन पाहि

पढ़ा देव पाठ नवा इनला , देश बर आस हो जाहि
कोनो भगत इंदिरा ता , कोन्हो सुबास हो जाहि

नवा पीढ़ी म जब संस्कार सुगंध हो जाहि
तभे गांव के लइका मन विवेकानंद बन पाहि

दारू अउ नशा ह जब  इन्हे ले बंद हो जाहि
तभे गांव के लइका मन विवेकानंद बन पाहि ।।


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17 . गांव के गवइया मै परदेशिया होगेंव (Chhattisgarhi Kavita)

गांव ला छोड़े रेहेव कमाए बर
लहुटे के अब मन नई करे अब घर जाए बर

फूल पेट पहिरथो अब में साहब बन गेव
खेती काबर कमहु फ़ोकट सनाय बर

बरसात के चिखला अब सुहाए नहीं
छत्तीसगढ़ी बोली मोला भाय नहीं

नखरा बाढ़ गए हे में टेसिया हो गए हव
गांव के गवइया मै परदेशिया होगेंव 

छत्तीसगढ़ी खाना अब सिट्ठा लगथे
घकार कस पिज़्ज़ा बढ़ मीठा लगथे

दूध दही महि मा मोला जुड़ धर लेथे
कोल्ड्रिंग कस दारू मोर मूड चढ़ लेथे

तीज त्यौहार अपन में मनाव नहीं
लोग लइका ला अपन संस्कृति बताओ नहीं

परम्परा नादागे में नौसिखिया होगेंव
गांव के गवइया मै परदेशिया होगेंव

भेजे रिहिस मोला कमाबे कहिके
घर के स्थिति ला स्वारबे कहिके

वो घर ला छोड़ में अपन खोंदरा बना डारेव
ओला कैसे छोड़ू कहिके के नखरा बना डारेव

घर अगोरथे लौटे के बेरा
मै बपरा पर बुधिया होगेंव

गांव के गवइया मै परदेशिया होगेंव
गांव के गवइया मै परदेशिया होगेंव ।।


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18 . सावन लागत वन हरियागे (cg kavita)

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Chhattisgarhi Kavita | छत्तीसगढ़ी कविता | CG Kavita

सावन लगत वन हरियागे
ताक साक सब डोलत हे

सुरुज ला तोपे करिया बादर
झांक झांक के देखत हे

डोरी ले पानी छलकत हे
झककर धरे हे छीटिर छीटिर

नदिया बोहावत पूरा आये हे
छानी चुहत हे टीपीर टीपीर

मेकरा टेटका केकरा मेकरा
निकले बिहनिया नाहा खोर के

पानी के अब भरोषा नई हे
बरसथे ओहा अंजोर अंजोर के

मयूर हा नाचे कानन में
पंख ला अपन खोल के

सावन लगत वन हरियागे
ताक साक सब डोलत हे ।।

दया माया ले जा रे मोर गांव ले अउ दया माया रहे राहु मोर शहर ले । आपमन ला ये Chhattisgarhi Kavita || छत्तीसगढ़ी कविता हा पसंद आहि ता की आप मन हा ये पोस्ट Chhattisgarhi Kavita || छत्तीसगढ़ी कविता ला किसे साँझा करना चाहत हो लोगन से ता शेयर जरूर करहु । अउ शेयर करे के मोर इहि मकसद हैवे की आपमन हा ज्यादा से ज्यादा जुड़व । अउ अगर मै कोशिश कर पात हो की हमर माटी के सेवा कइसे करन , संस्कृति के सेवा कइसे करन , नवा युवा मन ला कइसे आगू लान । नवा पीढ़ी के लइका मन ला छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी संस्कृति के बारे में कइसे बतान ।

ता ये कोशिश सब ला मिल के करना चाही ये Chhattisgarhi Kavita || छत्तीसगढ़ी कविता || CG Kavita ला आपमन के पास में लेकर के आय हाव ता ये Chhattisgarhi Kavita || छत्तीसगढ़ी कविता || CG Kavita  ला बगरहु ता मै हा अउ कोशिश करहु की अपन नवा नवा कविता ले परिचाव करवव ।

जय सिया राम , राम-राम संगवारी हो

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