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1+ छत्तीसगढ़ी लोक कथा || chhattisgarhi lok katha 

आज की इस पोस्ट में हम आपको छत्तीसगढ़ के लोक कथा के बारे में विस्तार के साथ में जानकारी देने वाले है और साथ ही हम आपको छत्तीसगढ़ के एक प्रचलित लोक कथा को छत्तीसगढ़ के भाषा में एक लोक कथा का भी वर्णन किया है ।

लोक कथा क्या है ? lok katha kya hai  

लोक कथा जिसे हम सामान्य भाषा में कथा भी कहते है । लोककथा का शाब्दिक अर्थ होता है लोक मतलब जन और कथा का मतलब होता है प्रचलित कहानी और दोनों को मिला दिया जाये तो बन जाता है लोककथा बनता है । अर्थात लोगो के द्वारा बोली गई और प्रचलित जनमानस की कहानी को ही लोककथा कहा जाता है ।

लोककथा पिछले कई वर्षो के लोगो के द्वारा बोले जा रहा है और उसी को सुनकर के लोग उसे दुसरो को सुना रहे है जो अभी भी हम सुनते है वही है लोककथा ।

लोक कथा लोगो के कई रूपों में हो सकता है जैसे की भाषा के आधार पर देखा जय तो भारत में कई सारे भाषा बोले जाते है और उन कई सारे भाषा कई छोटे छोटे स्थानीय भाषा भी है । इनमे देखा जाय तो जो अन्य राज्यों की भाषा होती है वंहा की लोककथा अलग होता है ठीक उसी तरह से लोगो के स्थानीय भाषा में भी कई सारे लोक कथा भी प्रचलित होते है जो वंहा के स्थानीय , ग्रामीण लोगो के द्वारा इस कथा को बोले जाता है और सुना भी जाता है ।

chhattisgarhi lok katha
chhattisgarhi lok katha

लोककथाय (lok katha in hindi() कई रूपों में हो सकता है स्तानीय लोक कथा और सांस्कृतिक लोक कथा । स्थानीय लोककथा का मतलब होता है अपने लोकल भाषा अपने स्तानीय ग्रामीण परिवेश की भाषा होती है जिससे वह पला होता है , उसे सुन कर के बड़ा होता है वह उसकी मात्र भाषा से हटकर के अलग होता है ।

ठीक वैसे ही संस्कृतक लोककथा (lok katha in hindi)में हमारी संस्कृति से जुड़ेहुए लोककथाएं होती है । जो हमारी संस्कृति के बारे में लोककथा के बारे में बतलाती है जिन्हे हम अपने संस्कृति के बारे में और अच्छे से जान पाते है ।

लोककथाओं का मूल उद्देश्य {chhattisgarhi lok katha}

लोककथाओं का मूल उद्देश्य मनोरंजन रहा है लेकिन ये सिर्फ मनोरंजन के लिए ही नहीं गढ़ी गई है , ये डायरेक्ट रूप से कई पीडियो की संचित ज्ञान की गाथाय है । लोककथा (lok kathayen in hindi)में किसी चरित्र , किसी घटना के माध्यम से इतिहास और सस्कृति को बतलाती है । लोककथाय मानव के इतिहास ही नहीं बल्कि इतिहास से कंही आगे समाज और संस्कृति की कलात्मक अभिव्यक्ति है । इसमें देखा जाए तो वृहत कथा , हितोपदेश , और पंचतंत्र जैसे शिक्षा देने वाली लोककथाएं है ।

chhattisgarhi lok katha में सृस्टि के रहस्यों से लेकर के प्राचीन तत्वों और भावनाओ को देखा जा सकता है । अलौकिकता , रहस्य , रोमांच , इसकी रोचकता को बढ़ाते है । लोककथाय (lok kathayen in hindi), लोकमानस की मूल भावना के रूप को स्थूल प्रतितो के द्वारा हमें दिखाती है ।छत्तीसगढ़ी लोक कथा समुद्र की तरह गंभीर है और इसकी विषय आकाश , पातळ सब कुछ है ।

छत्तीसगढ़ी लोक कथा में सबसे ज्यादा प्रचलित लोककथा है जैसे की चुरकी अउ मुरकी , कौवा अउ गौरैया , बावन के माया , बाघिन अउ छेरिया , चिरई अउ डार , हाथी गीदड़ , सही रद्दा , बकरी अउ शेर , राजा के लाल अउ देवन के लाल , सीता बसंत आदि पैराणिक सामाजिक chhattisgarhi lok katha कथा प्रचलित है ।

chhattisgarhi lok katha विषय की प्रकृति के अनुसार ये निन्मलिखित होते है – 

(1) सृस्टि विस्यक छत्तीसगढ़ के लोक कथा- chhattisgarhi lok katha

छत्तीसगढ़ी लोककथाओं  में सृस्टि से जुडी हुई लोककथा अनगिनत और अविकसित मनुष्य की कथा देखने को मिलती है । सृस्टि से जुडी हुई लोककथा (lok katha in hindi short)में छत्तीशगढ़ के प्रागैतिहासिक काल अर्थात इतिहास की पूर्व की कथा होती है । इस प्रकार के लोक कथाओ (lok kathayen in hindi) में मानव का प्रकृति से अनजान होने का प्रमाण मिलता है । जैसे की लोककथा (short lok katha in hindi) है – बादल अउ बुढ़िया की छत्तीसगढ़ी लोक कथाये .

(2) कृषि जीवन छत्तीसगढ़ के लोक कथा – chhattisgarhi lok katha

कृषि से जुडी हुई छत्तीसगढ़ी लोक कथा में किसानो की घर , खेत खलिहान , व्यापर धर्म , जंगल से सम्बन्थित बहुत सी कहानिया होती है जैसे की – तिलमति अउ चाउर मति , चुरकी – मुरकी , कंजूस सेठ , आदि कहानिया इसके अंतर्गत आती है ।

(3) पशु पक्षी सम्बंधित छत्तीसगढ़ के लोक कथा -chhattisgarhi lok katha

संस्कृत भाषा की कहानिया हितोपदेश और पंचतंत्र के सामान ही छत्तीसगढ़ की लोक कथा में में पशु पक्षियों के बारे में भी लोककथाय (short lok katha in hindi) है और ये लोककथाय भी दो प्रकार के होते है – 1 जिनमे सभी पात्र पाछू पक्षी के होते है , 2 . इसमें पशु पक्षी के आलावा मनुष्यो भी पात्र होते है । 

(4) पारिवारिक जीवन की छत्तीसगढ़ी लोक कथा  – chhattisgarhi lok katha

मनुष्य एक सामाजिक अतः अपने जीवन के खट्टे मीठे अनुभव को अपने आसपास के पत्रों से सजाकर के अपने दैनिक घटनाओ के साथ में दाम्पत्य हर्ष विषाद को प्रस्तुत करता है । और इसे कहानिया हमारे जीवन की सामाजिक , पारिवारिक कहानी पर आधारित होता है । और इसका सबसे अच्छा उदाहरण है गोंड गोडिन की दाम्पत्य जीवन की प्रचलित छत्तीसगढ़ी लोक कथा है ।

(5) बाल विषयक छत्तीसगढ़ की लोक कथा – chhattisgarhi lok katha

ऐसे लोक कहानिया बाल नमो विज्ञानं पर आधारित होता है । बाल लोक कथा का प्रमुख उद्देश्य मनोरंजन , शिक्षा , कल्पना को तृप्त करना है । इसके लिए दादा दादी , नाना नानी , आदि के द्वारा बाल मनोरंजन के रूप में कहानी सुनाने का काम करती है । इस बाल कहानी को भोजन करने के बाद में और ज्यादा तर बच्चो को सुलाने के लिए इस  छत्तीसगढ़ की लोक कथा कहानी को सुनाया जाता है ।

इस कहानी के अंत में दार भात चूर गे मोर कहनी पुर गे कहा जाता है या फिर से राजा ला मिल गे रानी , ख़त्म होइस मोर कहानी कहा जाता है । छत्तीसगढ़ की लोक कथा में रोचकता होती है जैसे की इस कहानी में बहुत प्रेत की कहानी , पशुपक्षी की कहानी , बोलने वाले जड़ आदि की कहानिया सबसे ज्यादा प्रचलित छत्तीसगढ़ के लोक कथा कहानी है ।

 (6) विविधः छत्तीसगढ़ की लोक कथा- chhattisgarhi lok katha

छत्तीसगढ़ी लोक कथा में कहानी की अथाह सागर है । यंहा कुछ प्रमुख और प्रचलित लोककथाओं (lok katha in hindi) के आधार पर अलग अलग भागो में बांटा गया है ।

छत्तीसगढ़ी लोक कथा का उद्देश्य प्रायः आदर्श वादी है लोककथाओं (lok kathayen in hindi) में नैतिकता पर ज्यादा जोर दिया गया है । जैसे की सत्य की विजय , बुराई पर अच्छे की जित इनमे देखने को मिलती है ।

 

छत्तीसगढ़ी लोक कथा 

1 . हाथी अउ कोलिहा – chhattisgarhi lok katha

एक बार के बात हरे एक ठन गांव के जंगल में एक ठन कोलिहा अउ एक ठन हाथी राहय . दुनो झन  के एक दिन जंगल में मुलाकात होइस अउ दुनो झन के अच्छा बात चित करिश ता ओखर मन में बात है लम्बा चालिश ता दुनो झन हा मितान बाधीस । 

दुनो झन के मितानी हा खूब चलिश । दोनों झन हा खुश रहे , खाय पिए अउ साथै साथ रहे , मस्ती करे .

एक दिन के बात हरे हाथी अउ कोलिहा हा जंगल में जाट रथे ता कोलिहा ला पानी पियास लग जथे ।

कोलिहा हा हाथी ला कथे मितान मोला अब्बड़ पानी पियास लगत हे । कोलिहा के बात ला सुन के हाथी का अपन मुड़ी ला उठा के जंगल के चारो कोठी ला देखते लेकिन जतिक दूर ले ओकर नजर हा जिस वतीक दूरिया तक हाथी ला पानी के कोन्हो निशान नहीं दिखिस ।

ता हाथी हा पानी नै दिखिस ता कथे देख मितान मोला तो पानी नई दिखत हे ता ते मितान अइसे कर की तेहा मोर पीठ में चघ के देख कथे अउ तेहा मोर पीठ में चढ़ के जे मेर कोकड़ा रही तेला देख लेबे अउ यही जगह में पानी होही ।

हाथी हा बैठ जाते अउ कोलिहा हा ओकर पीठ में चढ़ जथे । अउ चढ़ के देख लेते अउ देख के हाथी ला कथे मितान मोला जंगल के दूरिया में दिखत हे जिन्हे कोकड़ा मन हा बैठे हे अउ पानी हा चिकचिकात हे ।

हाथी का कोलिहा ला कथे जा देखे तेहा पानी ला पि के आबे मेहा यही करा रहु ।

कोलिहा हा पानी के खोज में जंगल में जिस अउ यही जगह में जिस अउ पानी नई मिलिस ता मुँह ला लटका के आ गइस अउ हाथी के पास में आते अउ कथे मोला तो पानी नई मिलिश अउ मोला अब्बड़ पिसे लगत हे ।

ता हाथी हा कथे मितान ते अइसे कर तेहा मोर पेट में खुसर जा अउ पेटभर पानी ला पिबे अउ पानी ला पाइक ऊपर कोती ला मत देखबे ।

कोलिया हा हाव मितान कहिके कथे अउ हाथी के पेट में खुसर जथे ।

हाथी के पेट के भीतर में खुसर के कोलिहा हा पेट भर के अपन प्यास ला बुझाइस अउ पानी पि के हाथी के बात हा याद आ जथे की काबर मोर मितान हा ऊपर dahan ला झन देखबे कहिस के सोच के कोलिहा हा हाथी के ऊपर ढाहन हा देख लेथे ।

कोलिहा हा देखते की हाथी के पेट में ओकर  करेजा हा लाल लाल दिखत रथे । करेजा ला देख के कोलिहा हा हाथी के करेजा ला खा देते अउ हाथी हा मर जथे ।

हाथी हा मर जथे ता कोहिला हा हाथी के पेट ले नई निकलन सके अउ हाथी के पेट में फस जथे । अउ लेट पते हाथी के पेट ले निकलथे ।

एक दिन मगर हा जात रथे ता कोलिहा हा मगर ला देख के कथे तै हा मोर ले बड़े हस के मई हा तोर ले बड़े हो .

मनगर हा कथे मई हा तोर ले बड़े हो । ता कोलिहा हा कथे ता ते बड़े हस ता पानी ला तै मोर तीर में .

कोलिहा के बात ला सुन के मनगर हा पानी ला ओकर teer में uchel देते . पानी में pare pare  हाथी के पेट हा fool  जथे अउ कोलिहा हा हाथी के पेट ले निकल के bhag जथे .

  मनगर हा कोलिहा ला मरे बार bikat कुदाते लेकिन कोलिहा ला पकड़ नई सके । मनगर हा कोलिहा ला पकड़ नई सकिस ता मन में सोचते की जब कोलिहा हा पानी पिए बर आहि ता ओला पकड़ लुंहू । ऐसे कही के तरिया के पानी में चले जथे । 

दूसर दिन जब कोलिहा है पानी पिए बार आते ता मनगर हा कोलिका के गोड़ ला जोर के मुँह में पकड़ लेथे । कोलिहा हा बढ़ चतुर रथे । कोलिहा हा मनगर ला बेकूफ़ बनाय बार कथे मनगर ते तो लकड़ी ला मुँह में दबा हस ।

कोहिला के बात ला सुन के मनगर हा कोलिहा के गोड़ ला छोड़ देथे अउ कोलिहा हा मनगर बेकूफ़ बनाके भाग जथे ।

कोलिहा हा भाग जथे ता मनगर हा बढ़ गुस्सा हो जथे अउ बदला ले के कोशिश करहु कर के ओहा मैन के डोकरी अउ लाडू  बना के कोहिला के जाय के रद्दा में रख देथे ।

कोलिहा हा जंगल में घुमत घुमत यही रद्दा में चल देथे अउ ओहा कोलिहा हा डोकरी अउ लड्डू ला देख लेथे अउ ओकर तीर में जथे अउ कथे ये डोकरी दाई , ये डोकरी दाई लड्डू दे , लड्डू दे । बार बार कोलिहा हा कहे ता डोकरी हा कुछु जवाब नहीं दे ता कोलिहा ला गुस्सा आ जथे अउ मैन के डोकरी ला जोर से मारथे ।

जैसे ओहा डोकरी ला मारथे वहींसे ही सब्बो मैन हा ओकर हाथ में चिपक जथे अउ मनगर हा ये ला लुका के देखत रथे ता मनगर हा रस्सी में बांध के कोलिहा हा ले जथे ।

अउ मनगर हा कोलिहा हा ले जाके दू दू कोटला मारे अउ मनगर के मार में कोलिहा के हाथ गोड़ हा फूल जथे ।

एक दिन एकठन मरहा आसान कोलिहा हा घुमत घुमत यही रद्दा में चले जथे जिन्हा कोलिहा बंधे रथे । अउ मरहा कोलिहा हा ओकर तीर में आथे  अउ कथे सागा ते हा हा खाय हस बढ़ मोटा गेहस ।

मरहा कोलिहा के बात का सुन के बंधे कोलिहा हा कथे मोला तो मोर मालिक हा बढ़ बढ़िया खाना देथे बिहनिया मोला 5 लाडू , 5 सुनहारी अउ साँझ के मोला 5 लाडू , 5 सुनहारी ।

मरहा कोलिहा हा ललचा जथे अउ कथे कुछ दिन मोला तोर मालिक के घर में रहन्दे कहिके के बंधे कोहिला ला बंधे रस्सी ला खोल के अपन हा ओमे बंधा जथे  .

जैसे रस्सी हा निकलते बंधे चतुर कोलिहा हा भगा जथे ।

मरे कोलिहा हा कर कोटला ला धर के मनगर हा आते अउ ओला दो कोटला मारथे । मनगर के मर ला देख के मरहा कोलिहा हा सोचते की मारे के बाद में खाय ला देत होही कथे लेकिन शाम होते तहन हा ओला दू कोटला अउ मारते ..

मनगर के मार ला देख के मरहा कोलिहा हा कथे महा हा ओ कोलिहा नो हो जिला तेहै मारत रहे हस अउ ऐसे कही के सबो बात ला सुना देथे । ओकर बाद में ओला मनगर हा ओकर बात ला सुन के मनगर हो ओला छोड़ देथे


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