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dhokra art chhattisgarh || chhattisgarh handicrafts

dhokra art chhattisgarh | chhattisgarh handicrafts

dhokra art chhattisgarh राज्य के एक प्रसिद्ध कला कृत है , जो अपने अपने कला के माधयम से ( हाथो के माध्यम से ) छत्तीसगढ़ के प्राचीन कलाओ को मूर्तियों में दिखाने का प्रयास करते है । बस्तर के लोग इस कलाकृति में में इतने महारत है की इसे बारीकी के साथ में मूर्तियों को रूप देते है की जिससे छत्तीसगढ़ के लोककला को देखा जा सकता है ।

dhokra art chhattisgarh कंहा स्थित है ? 

डोकरा आर्ट भारत के एक छोटे से राज्य छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में स्थित है । जो छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणतम भाग में स्थित है । बस्तर क्रमशः इसके पूर्व और पश्चिम में उड़ीसा और महाराष्ट्र राज्यों से घिरा है। बस्तर क्षेत्र अपनी प्राचीन संस्कृति , अपनी प्राचीनतम  कलाकृति , प्राचीनतम शिल्प कृति , प्राचीनतम लोकसंस्कार और प्राचीन रहन-सहन के साथ में घने जंगलो से आच्छादित एक छोटा सा छत्तीसगढ़ राज्य के जिले है ।

इस जिले के लगभग 70 प्रतिशत आबादी आदिवासी लोगो का है जिनमे , गोंड , अभुज मरिया , मदिया , दोरला , बाइसन हॉर्न मारिया, मुनिया डोरिया, ध्रुव, भातरा और हलबा आदि प्रमुख जाती है । जिनका काम है dhokra art chhattisgarh , शिल्पकला , वनोपज से , कलाकृति से इनकी जीवन यापन करते है । विशिष्ट व्यवसाय करने वाले अन्य समुदाय भी जिले में पाए जाते हैं, जैसे गढ़वा जाति  ( समुदाय ) , जो ढोकरा शिल्प में लगे हुए हैं ।

dhokra art chhattisgarh देखने के लिए कैसे आ सकते है ?

बस्तर पहुंचने के लिए आप सीधे रायपुर से बस्तर जंहा से बस्तर पंहुचा जा सकता है । रायपुर से बस के माध्यम से आप बस्तर पहुंच सकते है । ढोकरा शिल्प के लिए बस्तर में क्लस्टर कोंडागांव और जगदलपुर हैं, जो रायपुर से क्रमशः 225 किमी और 298 किमी दूर स्थित हैं ढोकरा कला छत्तीसगढ़ कला की विशिष्ट विशेषता है। घने जंगलो के बीच , वनो से आच्छादित , कोयल की चहचहाने की आवाज , बस्तर की झरझराती नदिया , बाजारों से गिरा छोटा छोटा गांव और इसकी यंहा की बोली मन को भा लेती है । यंहा  की विशेष बोली सुनते ही और सुनने का मन करता है ।

जब संस्कृति की धुन बजती है तो मन नाचने के लिए उठ खड़ा होता है । यंहा की लोकनित्य मन मोह लेती है , मदार की थाप के साथ जम उठेंगे । क्या बताऊ इसके जितने भी बखान किया जाय उतना कम है , जब आप यंहा पहुंचकर के इनके भोलेपन को देखेंगे तो दंग रह जायेंगे । यंहा की घर छोटे छोटे है लेकिन मन इनका बड़ा है । यंहा मेहमान का विशेष सेवा की जाति है इसी कारण बस्तर आज भी अपनी प्राचीन संस्कृति , अपनी प्राचीन सभ्यता , अपनी प्राचीनतम बोली के लिए आज भी विश्वप्रसिद्ध है ।

dhokra art कैसे बनाया जाता है ? 

यह एक प्राचीन विधि है जिसके द्वारा मोम की ढलाई तकनीक के माध्यम से धातु के शिल्प बनाए जाते हैं। यह एक पर्यावरण हितैषी बेड़ा है क्योंकि यह बेकार धातु का उपयोग करता है । ढोकरा एक अलौह धातु है जिसे खोई हुई मोम की ढलाई तकनीक का उपयोग करके विभिन्न उत्पादों में डाला जाता है जिससे बस्तर के लोग इसे विशेष कला के माध्यम से उसे मूर्ति के रूप देते है ।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में ढोकरा कला के माध्यम से मोम को पिघलाकर के बनाया जाता है इसके आलावा इनके प्राचीनतम कला पीतल , तांबा को भी पिघलाकर के शिल्प रूप दिया जाता है । तांबा और पीतल से स्थानीय देवी देवताओ , सूर्य , चन्द्रमा , पशु-पक्षियों , वनस्पति आदि के मूर्ति रूप प्रदान किया जाता है ।

dhokra art का इतिहास 

dhokra art एक प्राचीन कला आर्ट है जो भारत में लगभग 4000 वर्षो के उपयोग किया जा रहा है । ढोकरा शिल्प मोहनजोदड़ो और हड्डपा सभ्यता के अवशेषो में ढूंढा गया , जो उद्योग के ऐतिहासिक महत्व को साबित करता है । मोहनजोदड़ो में खोजी गई नृत्यांगना लड़की मूर्ति शिल्प की उत्पत्ति और निरंतरता का प्रमाण है। यह परम्परा निरंतर चली आ रही है , जो कला के रूप की आंतरिक दृढ़ता और जीवन शक्ति के साथ युग्मित है,

जो ढोकरा उत्पादों को पारखी, विद्वानों और आम लोगों के लिए समान रूप से भारत और विदेशों में कलेक्टरों की वस्तुओं को प्रतिष्ठित करता है। ढोकरा कला बस्तर में एक प्रमुख आकर्षण है। घड़वा छोटे कारीगर समूह हैं जो पीतल या धातु की धातु की वस्तुओं का उत्पादन करते हैं।

बस्तर में ढोकरा आर्ट के आने के पीछे कथा है जो इस प्रकार से है :-
तीन सौ साल पहले की बात है , उस समय के बस्तर के शासक , राजा भानचन्द को अपनी प्रेमिका के लिए एक उपहार के रूप में “ढोकरा” शिल्प में तैयार किये हुए हार भेट किया गया था । उसकी प्रेमिका ने इस हार की शिल्प से इतना खुश हुई और बनाने वाले कारीगर को उपहार देने के लिए , उसके सम्मान करने के लिए उसने “घड़वा” नाम से उपाधि देने फैसला किया गया । जिसके सम्मान के माध्यम से ये आज भी परम्परागत रूप से आज भी प्रचलित है निरंतर चल रही है ।

घड़वा नाम घालना शब्द से लिया गया था जिसका अर्थ होता है पिघलना और मोम के साथ काम करना । इसलिए चुकी ये लोग खोई हुई मोम तकनीक के माध्यम से प्लास्टिक को पिघलाकर के शिल्प वस्तुय तैयार किये जाते है इसलिए इसका नाम “घड़वा” नाम दिया गया ।

“घड़वा” नाम की उत्पत्ति गड़ना सब्द से हुई है “घड़ना” को छत्तीसगढ़ में बनाना या रूप देना कहा जाता है । “घड़ना” को बनाने वाले , मूर्त रूप देने वाले , रूप देने वाले कारीगरों को कहा जाता है जो मुख्य रूप से तांबा , पीतल आदि से सामान को बनाने का काम करते है । छत्तीसगढ़ में इन कारीगरों को क्षेत्रों के हिसाब से , स्थानीय भाषा के हिसाब से अलग-अलग नामो से जाना जाता है जो इस प्रकार से है – घसिया , खसेर , मंगन , विश्वकर्मा , ताम्रकार आदि कहा जाता है । ये क्षेत्रीय विशेस्ता है ।


dhokra art is a famous art work of chhattisgarh state, which tries to show the ancient arts of Chhattisgarh through its own art (through hands) in sculptures. The people of Bastar are so masterful in this artwork that they give it the shape of sculptures in detail so that the folk art of Chhattisgarh can be seen.

Where is dhokra art chhattisgarh located?

dhokra art chhattisgarh || chhattisgarh handicrafts
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Dokra Art is located in Bastar district of Chhattisgarh, a small state of India. Which is located in the southernmost part of the state of Chhattisgarh. Bastar is bounded by the states of Orissa and Maharashtra to its east and west respectively. Bastar region is a small district of Chhattisgarh state covered with dense forests with its ancient culture, its oldest artwork, oldest craft work, oldest folk rites and ancient living habits.

About 70 percent of the population of this district is of tribal people, in which Gond, Abhuj Maria, Madiya, Dorla, Bison Horn Maria, Munia Doria, Dhruva, Bhatra and Halba etc. are prominent. Whose work is dhokra art chhattisgarh, they make their living from craftsmanship, forest produce, artwork. Other communities with specialized occupations are also found in the district, such as the Garhwa castes (communities), which are engaged in the Dhokra craft.

How can I come to see dhokra art chhattisgarh?

To reach Bastar, you can reach Bastar directly from Raipur from where Bastar can be reached. You can reach Bastar via bus from Raipur. The clusters in Bastar for Dhokra craft are Kondagaon and Jagdalpur, which are located 225 km and 298 km respectively from Raipur. Dhokra art is the distinctive feature of Chhattisgarh art.

Amidst the dense forests, covered with forests, the sound of cuckoos chirping, the gurgling river of Bastar, the small village falling from the markets and its speech here is pleasing to the mind. As soon as I hear the special dialect here, I feel like hearing more.

When the tune of culture is played, the mind rises to dance. Here’s folk routine fascinates the mind, will get frozen with the beat of Madar. What can I tell, the less it is mentioned, the less it is, when you reach here and see their innocence, you will be stunned. Here the house is small but their mind is big. Here the guest has a caste of special service, that is why even today Bastar is world famous for its ancient culture, its ancient civilization, its oldest dialect.

How is dhokra art made?

It is an ancient method by which metal crafts are made through the wax casting technique. It is an eco friendly fleet as it uses waste metal. Dhokra is a non-ferrous metal that is cast into various products using the lost wax casting technique, whereby the people of Bastar give it the form of an idol through a special art form.

In Bastar, Chhattisgarh, Dhokra is made by melting wax through art, besides their oldest art, brass, copper are also melted and given a craft form. Idol forms of local deities, sun, moon, animals, birds, vegetation etc. are provided from copper and brass.

History of Dhokra Art

Dhokra art is an ancient art form which is being used in India for almost 4000 years. The Dhokra craft was discovered in the ruins of Mohenjodaro and Harappa civilization, which proves the historical importance of the industry. The dancer girl idol discovered at Mohenjodaro is a testament to the origin and continuity of the craft.

This tradition continues unabated, coupled with the intrinsic tenacity and vitality of the art form, which makes Dhokra products coveted objects of collectors in India and abroad for connoisseurs, scholars and laymen alike. Dhokra art is a major attraction in Bastar. Ghadwa are small artisan groups who produce brass or metallic metal objects.

The story behind the arrival of Dhokra Art in Bastar is as follows:-
Three hundred years ago, Raja Bhanchand, the ruler of Bastar at that time, was presented with a necklace crafted in “Dhokra” craft as a gift to his beloved. His girlfriend was so pleased with the craft of this necklace and decided to give a gift to the craftsman who made it, to honor him with the title “Ghadwa”. Through whose respect it is still traditionally practiced even today, it is going on continuously.

The name Ghadwa was derived from the word Ghalana which means to melt and work with wax. That’s why these people made crafts by melting plastic through the lost wax technique, hence the name “Ghadwa“.

The name “Ghadwa” is derived from the word “Gadna”; “Ghadna” is said to make or give form in Chhattisgarh. Artisans who make, embody, give form to “Ghadna” are called, who mainly work in making goods from copper, brass etc. In Chhattisgarh, these artisans are known by different names according to the region, according to the local language, which are as follows – Ghasia, Khaser, Mangan, Vishwakarma, Tamrakar etc. This is a regional specialty.

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