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इंटरनेट से पैसे जुटाकर स्कुल बनाने वाले राहुल दुबे GOLDMEDLIST SUCCESS STORY

ये GOLDMEDLIST SUCCESS STORY राहुल दुबे की है जो बहुत ही कम उम्र में एक छोटे से गांव करवाड़ा “विलेज सप्रेट अकादमी” शुरुआत करने वाले की स्ट्रगल एंड मोटिवेशनल स्टोरी के बारे में जानने वाले है –

परिचय राहुल दुबे की 

राहुल दुबे दिल्ली के रहने वाले है । राहुल दुबे दिल्ली में रामजस कालेज दिल्ही यूनिवर्सिटी में ग्रैजुएशन मैथमेटिक्स में गोल्डमेडलिस्ट थे । एक कैम्पस के दौरान राजिस्थान ( जयपुर ) के एक छोटे से गांव अल्फा एजुकेशन सोसाइटी में पढ़ाने के लिए पहुंचे । दिल्ली से एक छोटे से गांव करवाड़ा में पहली बार एक आदिवासी गांव में जहां पर पहली बार , खेत , गांव , गाय बैल , किसानी को देखा इसके पहले तक नहीं देखे थे ।

इस आदिवासी छोटे से गांव में दिल्ली से 3 हफ्तों के लिए 2012 में आये थे तब उस समय उम्र 19 साल के थे । जहां पर भाषा बोलने में बहुत ही बड़ी दिक्क्त थी । वंहा पर काम करना बहुत बड़ी मुश्किल काम था । 19 साल के उम्र में ये नहीं पता था की जिंदगी में क्या करना है । वंहा परअल्फ़ा एजुकेशन सोसाइटीसे एक वालेंटियर के तौर पर सरकारी स्कूल में बिना वेतन लिए पढ़ाने के लिए जाते थे । स्कूल में बच्चो में जो इंग्लिश , गणित और हिंदी और जो भी आते थे उसे पढ़ाते थे ।

पढ़ाते समय वंहा के लोकल भाषा का ज्ञान न होने के कारण बच्चो से बात नहीं कर पाते थे ।  3 हफ्तों तक बच्चो को पढ़ाने के बाद {कॉलेज से फ़ोन में इंटरशिप ख़त्म होने का फ़ोन आता है की आपका इंटरशिप ख़त्म हो गया है आप वापस आ जाओ} । लेकिन उस समय 3 हफ्तों तक समय बिताने के बाद लगने लगा था वंहा के परिवेश को समझने लगे थे, भाषा को समझने लगे थे , लोगो और गाँवो से लगाव हो चला था । इसके बाद वापस फ़ोन में 3 महीने और रुकने का प्लान बनाते है और 3 महीने तक गांव में फिर रुके । 

rahul dubey
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इसके बाद से वहां के भाषा, बोली को पूरी तरीके से समझने लगे , 3 महीनो के भीतर सभी गांव के लोगो के साथ घुलमिल गए । इसके बाद गांव के लोगो के साथ लगाव और जुड़ाव बढ़ने के बाद से फिर से दिल्ली में 6 महीने रुकने का फ़ोन करते है , उसके बाद 1 साल रुकने का फ़ोन करते है और पुरे एक साल तक के एक छोटे से गांव में रहने शुरू कर दिए , वंहा की बोली-भाषा , रहन-सहन , खेती-बाड़ी त्यौहार को पुरे तरीके से अपनाने लगे थे । और ऐसे करते करते 2012 से 2018 तक इसी छोटे से गांव में रहने लगे ।


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ये गांव ऐसा था की वंहा चलने के लिए रस्ते है थे ऐसे गांव में सुबह 7 बजे पैदल निकलते थे , और 8 बजे सेन्टर पहुंचते थे बच्चो को पढ़ाने के लिए और जहा 40 से 50 बच्चो के समूह को पढ़ाया करते थे । उसके बाद धीरे-धीरे अन्य ग्रुप के बच्चो को भी पढ़ाते थे । लगातर 3 महीने तक बच्चो को पढ़ाते रहे ।

गांव में एक ऐसी सड़क थी जो पिछले 50 सालो से नहीं बन पा रही थी ऐसे सड़क को 30  यंग लोगो के साथ मिलकर 500 मीटर की सड़क को 3 दिन में काफी मेहनत, खुद काम करके कच्ची रोड बनायीं । इसके बाद पंचायत ने 10 दिन बाद कैसे भी करके रोड बनाने शरू कर दिए ।

 राहुल दुबे {GOLDMEDLIST SUCCESS STORY} एक इंटरव्यू में बताये है की 2012-2013 में परिवार घर वाले बिना बताये कंहा है ? , क्या कर रहा है ? ये सभी प्रश्न से करते और उस समय आपके घर वाले की तरफ से काफी प्रेस्सर भी थे । और एक साल पूरी पढ़ाई से गैप कर लेते है ।

राहुल दुबे GOLDMEDLIST SUCCESS STORY स्ट्रगल भरे दिन 

आपने 2013 में राजिस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय से (MSW) मास्टर इन सोशल वर्क से करनी शुरू की घर वाले , इस निर्णय से परेशान थे और मास्टर को मैथमैटिक्स में करने को जोर देते थे लेकिन आपको समाज के लिए कुछ करने के उद्देश्य से मास्टर इन सोशल वर्क को करते है । 2013 से 2015 तक आपके लिए सबसे बड़ी चुनौती थे । उस समय आप 3-4 संस्थाओ के साथ में काम करते थे । जिसमे में था  मुख्य अल्फ़ा एजुकेशन सोसाइटी था ।

उस समय की डेलीय का रूटीन सुबह जल्दी उठकर के टैक्सी से 9 बजे तक कालेज जाते और क्लास अटेंड करने के बाद में 4 बजे के बाद फिर वापस गांव की तरफ जाते । जाते जाते रात के सात बजे तक गांव में जाते थे और गांव वालो से रात के 10 बजे तक बात करते थे । फिर रात को 2 बजे काम करके सुबह कालेज के लिए जाते थे ।


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आपने इक इंटरव्यू में बताया है की लगातार 2 सालो तक सुबह शाम तक काम करते आपको बहुत परेशानी भी झेलने पड़े थे जिसमे शरीर में ब्लड की कमी, इन दो सालो के बीच में आपका वजन भी कम होने लगे थे ।

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आपने एक और इंटरव्यू में बताया है की उस समय ऐसी स्थिति को देखकर के लोगो ने , यंहा तक की जिस सामाजिक संस्था में काम करते थे वह के लोगो ने भी एक साथ दोनों कामो को नहीं कर सकते ऐसे बोला करते थे । या तो पढ़ाई करलो या फिर काम कर लो दोनों में से एक काम को कर लो । इसके बाद कई संस्था वालो ने भी काम से निकल भी दिया था ।  लेकिन कही भी हार नहीं और लगातार पूरी कोशिश के साथ में जोरो से मेहनत करते रहे । इस बीच में लोगो के ताने और डेमोटिवेशन करने वाली बातें ही आपको आगे बढ़ने का मौका देती रही ।

सफलता के दिन सक्सेस 

आप बताते है की जुलाई 2015 में मास्टर के एग्जाम के रिजल्ट में यूनिवर्सिटी टॉप और गोल्डमेडलिस्ट रहे । इसी माह में आप बिना वेतन के वालेंटियर के रूप में काम कर रहे अलफ़ाएडुकेशन सोसाइटी में वॉइस प्रेसिडेंट की पद मिलता है और काम करने लगते है ।

आगे राहुल दुबे बताते है कि अल्फ़ा एजुकेशन सोसाइटी में काम करते-करते अपने दोस्त योगेश के साथ एक स्कूल खोलने की सोचते थे लेकिन उस समय ये पता नहीं था की नहीं थे , पैसे कंहा से आएगा नहीं जानते थे, कैसे काम होगा । पैसे कि कमी को पूरा करने के लिए जयपुर में ऑनलाइन कैंपन इस उद्देश्य से चलाते है कि यदि लोगो को विश्वास होगा तो पैसे डोनेट करेंगे 3 महीने के अंदर 6.5 लाख रुपए इकट्ठे किये ।

vilaage sprest school
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इसके बाद आपके दोस्त योगेश के भूमि डोनेट के बाद स्कूल के निर्माण शुरू होता है । इस स्कूल को बनाने में भी काफी दिक्कते को सामना करते है । कच्चे मिटटी के एक ऐसा घर था जहा ठण्ड के दिनों में गर्म और गर्मी के मौसम में ठंडी लगे ये इट से बनाने है । एक समय ऐसा भी था कि लोगो का सपोर्ट नहीं मिलते थे तो अकेले आप स्वं गैंती-फावड़ा लेके काम करने करने लगे , बाद में लोगो गांव के लोगो से सपोर्ट मिलने के बाद में 15 दिनों के भीतर स्कूल को पूरा बना लेते है ।

15 दिनों तक के मेहनत में मिटटी के स्कूल के लिए काफी चैलेंज भरा था  बारिश के मौसम था रात के समय यदि मौसम बदल जाते थे तो रात-रात भर जग के त्रिपाल लेकर बदल को निहारते रहते थे । आँधी तूफान आने पर दोस्तों के त्रिपाल लेकर चले जाते थे ताकि मिटटी के घर भीगे न ।

इस प्रकार राहुल दुबे GOLDMEDLIST SUCCESS STORY जी दिल्ली से इतनी कम उम्र में ही सामाजिक भावना लाना एक अपनी आप में बहुत बड़ी बात है । ये जर्नी 2012-2018 तक दिल्ली से निकलकर के एक राजिस्थान के छोटे से गांव में बेहतर शिक्षा के लिए राजिस्थान के उदयपुर के नजदीक जिले खेरवाड़ा के एक छोटे से गांव करवाड़ा “विलेज सप्रेट अकादमी” जंहा बच्चो को हर प्रकार शिक्षा देने  कि शुरुआत की ।

:- आप इसे डोनेट भी कर सकते है – https://www.alfasociety.org/donation.php  _-:


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