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Best हरेली तिहार | Hareli Tihar | Hareli Kab Hai 2023

भीषण गर्मी के बाद में वर्षा होने के बाद में हरा भरा धरती को कृतग्यता प्रकट करने के लिए पुरे छत्तीसगढ़ राज्य के सभी गावो , कस्बो और शहरों में Hareli Tihar मनाया जाता है । हरेली का पर्व (hareli festival) छत्तीसगढ़ का सबसे लोकप्रिय पर्व कहा गया है । जिसे छत्तीसगढ़ में हरेली के त्यौहार को इस राज्य के प्रथम त्यौहार के रूप में मनाया जाता है ।

वैसे तो यह मूल रूप से कृषको का पर्व माना गया है लेकिन इस पर्व में हर वर्गों के लोगो की अपनी अपनी अलग-अलग भूमिका होता है ।

हरेली शब्द की उत्पत्ति –

हरेली शब्द (hareli tihar) की उत्पत्ति हिंदी शब्द हरियाली से उत्पन्न हुआ है । इसका मतलब वनस्पति या हरियाली होती है । छत्तीसगढ़ के गोड़ जनजाति है यह मुख्यरूप से यह त्यौहार होता हैHareli Tyohar Kab Hai- यह त्यौहार हिन्दू कलेण्डर के सावन माह के अमवस्या के दिन हरेली के पर्व को मनाया जाता है । यदि अंग्रजी कलेण्डर की बात करे तो जुलाई और अगस्त माह के वर्षा ऋतू के मध्य यह त्यौहार मनाया जाता है ।

जैसे ही वर्षा ऋतू होती है उसके कारण से वातावण में हरियाली आने शुरू हो जाते है । इसी कारण से हरियाली शब्द से ही हरेली शब्द (hareli tihar) की उत्पत्ति हुई माना जाता है । और यह त्यौहार सावन के महीने के शुरुआत को प्रकट करता है जिसे हिन्दुओ का पवित्र त्यौहार माना जाता है ।

Hareli Tihar के रस्म –

हरेली तिहार का रस्मो में विभिन्न सारे रस्मो को निभाना पड़ता है जो बहुत ही हमारी धरती और हृदयता से जुडी हुई है ।

हरेली त्यौहार (hareli tihar) के पहले ही दिन से हरेली पर्व का रस्म शुरू हो जाता है । हरेली त्यौहार (hareli festival) के पहले दिन बैल गाय को चराने वाले ( यादव लोग ) जंगलो में जाकर के जड़ी बूटी को ढूंढ़ते है । और जड़ी बूटी को ढूंढना एक विशेष दिन ही किया जाता है । कहा जाता है की ऐसी जड़ी बूटी एक विशेष दिन ही दिखाई देते है ।

जगले से लाये हुए जड़ी बूटी को लेकर के हरेली पर्व के दिन तैयार किया जाता है ।

हरेलि के पर्व (hareli festival) का पहली रस्म होता है जिसमे तालाब के जल को आवश्य्कता के अनुसार एक लोटा लाकर के गेहू के आते से लोधी ( निवाला) बनाकर  के उसके अंदर नमक डालकर के डांग कांदा ( विशेष किस्म का कंदे के समान फल जो स्वादिस्ट होता है जिसे भून कर और उबालकर के खाया जाता है । ) के पान के साथ में लपेटकर के खिलाया जाता है । यह पहला रस्म शुबह के समय ही किया जाता है ।

इसके बाद में जब जानवरो को जब गौठान में ले जाया जाता है तब उनके साथ सूपा या अन्य माध्यम से अपने घरो से चावल को साथ में ले जाया जाता है जिसे बैल चराने वाले यादव को दिया जाता है । उसके बदले में जड़ी बूटी दिया जाता है । इस जड़ी भीति को जानवरो को खिलाया जाता है ताकि बैलो और गायो को किसी भी प्रकार के कोई बीमारी न लगे ।

जड़ी बूटी कोई अनिवार्य नहीं होता है कोई इसे खिलाते है और कोई इसे नहीं खिलाते है । ये उनकी मर्जी होती है ।

इसके साथ ही साथ में सीतला मंदिर और ग्राम के देवी देवताओ की अच्छी फसल की कामना करते हुए पूजा पथ करते है ।

इसके साथ ही घरो में महिलाय और पुरुष अपने घरो में उपयोग होने वाले उपकरणों को , औजारों को तालाब में धोकर के उन्हें सुद्ध करते है । जिसमे प्रमुख औजारों को कृषि के काम में बहुतया से उपयोग में लाया जाता है जैसे – हसिया , टांगिया , कुदाली , गैती , बींधना , सब्बल , रापा, नागर , जुड़ा , बसला , और अन्य सामने को तालाब से धोकर के लाते है ।

धोकर के लाने के बाद में उन्हें एक विशेष स्थान जंहा पर नई मिटटी को रखा जाता उसके ऊपर इन औजारों को , उपकरण को उस मिटटी के ऊपर में रखा जाता है । उसके बाद में उसकी पूजा की जाती है ।

इन औजारों की पूजा करने के लिए चीला रोटी ( चावल की बनाई पतली रोटी ) जिसे विशेष रूप से चढ़ाया जाता है । चीला रोटी के बैगर यह पूजा अधूरा माना जाता है । उसके बाद में हुम् , धुप , अगरबत्ती , नारियल , बंदन के साथ में इन औजारों का अपने कृषि में साथ दिए इसके लिए उनका शुक्रगुजार करते हुए उनका धन्यवाद दिया जाता है और उनकी रक्षा करने की आशीर्वाद मांग कर के पूजा की जाती है ।

गांव के देवी देवताओ के पूजा करने के बाद में यादव समाज के लोग जो गांव में पशुओ को चराते है वे गावो के घर घर जाकर के लिम के डारा को घर के दरवाजे में या फिर गाड़ियों में लगाते है कहा जाता है की लीम के पत्तो को लगाने के पीछे घर में शुद्धिकरण मन जाता है । जिसके बदले में उनके चावल , दाल , मिर्च , नमक , अन्य खाद्य पदार्थ दिया जाता है ।

चुकी नीम विषाणु नाशक होता है इसीलिए हरेली के हर घर में नीम के डाली खोचने की परम्परा है । इसे देखकर के ऐसा लगता है मनो सावन की हरियाली घर आंगन तक भी पहुंच गई है ।

श्रावण अमावस्या की रात सबसे अँधेरी रात होती है और इस दिन कोई भी घर से बहार नहीं निकलती है । इसके रात से बैगा नव को पूरी तरह से बांध देता है ताकि गांव में कोई भी बुरी शक्तिया न प्रवेश कर पाए ।

इसके आलावा गांव में जिसके यंहा देवी देवताय है या फिर गोड़ समुदाय के लोगो के द्वारा अपने देवताओ के कोदो खली को नई मिटटी के साथ मिक्स करके अपने देवी देवताओ के स्थान को साफ सफाई करते है । उसके बाद में उनकी सभी बिरादरियों एक साथ मिलकर के पूजा अर्चना करते है । और अपनी फसल की अच्छी के लिए अच्छी कामना करते है ।

इसके अलावा घरो में मिठाईया , पकवान जैसे की पूड़ी रोटी , भजिया , चीला , ठेठरी , खुरमी , बड़ा , सुहारी और अन्य पकवान घरो में बनाये जाते है ।


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पूजा पाठ – इस दिन कुटकी देवी की पूजा की जाती है जिसे फसलों के देवी के नाम से भी जाना जाता है की पूजा अर्चना की जाती है । कुटकी दाई की पूजा फसलों की अच्छी फसलों के लिए इस देवी का पूजा की जाती है ।   

गेड़ी की भूमिका –

हरेलि (hareli kab hai) जंहा किसानो के लिए पूजा का त्यौहार है तो वंही बच्चो के लिए यह त्योहार मनोरजन का त्यौहार है । इस दिन सुबह से ही बच्चे गेड़ी बनाने की तयारी में लग जाते है ।

हरेली के पर्व (hareli festival) का मुख्य आकर्षण का कारण गेड़ी को भी माना जा सकता है । गेड़ी एक बास की बनी होती है जिसके बिछ में बांस का ही छोटे से खांचे बनाये जाते है जिस पर चढ़कर के एक स्थान से दूसरे स्थान में बड़े ही हिचकोले करते हुए जाता है जिसकी लम्बाई आवस्यकता के अनुसार बनाया जाता है इसकी लम्बाई  7 फ़ीट से लेकर के 25 फ़ीट लम्बी तक बनाया जाता है । जब गेड़ी में चढ़कर के चला जाता है तब रोइ-चोई की आवाज निकलती है मानो यह हरेली के त्यौहार में तान छेड़ रही हो जो जिससे सुनने में मधुर प्रतीत होता है ।

गेड़ी को 7 साल से लेकर के 20 साल तक के युवा भी अपने अपने मनोरंजन के लिए इसे बनाते है और उस पर चढ़कर के अपना मनोरजन करते है ।

इस प्रकार से बच्चो के द्वारा पूजा के बाद में अपनी अपनी सुविधा के अनुसार , अलग अलग उचाई की  अपने सुविधा के अनुसार बनाते है ।


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गेड़ी से जुड़े ऐतिहासिकता –

इतिहास के जानकारों की यदि माने तो गेड़ी का इतिहास 3000 साल पुराना है । अविभाजित छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश कालांतर में घने जंगलसे घिरा हुआ था । बारिश के मौसम में यह अविभाजित प्रदेश पानी से भरा हुआ रहता था जिससे टापू की दिखलाई पढ़ते थे । इस कारण से एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने के लिए गेड़ी का इस्तेमाल लिया जाने लगा । जिससे कई फायदे होते थे एक तो उनसे सर्प, बिच्छू से बच जाते थे और दूसरा पानी से भरे हुए स्थान को पार करने में आसान हो जाते थे ।

धीरे-धीरे यही गेड़ी की कला नृत्य ला रूप ले लिया और बाद में यही कला पारम्परिक कला का रूप ले लिया ।

बस्तर में हरेली त्यौहार

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बस्तर में यह त्यौहार हरेली त्यौहार को अमुष त्यौहार के रूप में जाना जाता है । इसमें बस्तर के लोग रसना बूटी और देवहारी के पत्ते को घरो में लगाते है । इस त्यौहार के एक दिन पहले बस्तर के लोग सामूहिक रूप से देवी देवताओ की पूजा अर्चना करते है ।

Hareli Kab Hai 2023

Hareli Tyohar Kab Hai- यह त्यौहार हिन्दू कलेण्डर के सावन माह के अमवस्या के दिन हरेली के पर्व को मनाया जाता है । यदि अंग्रजी कलेण्डर की बात करे तो जुलाई और अगस्त माह के वर्षा ऋतू के मध्य यह त्यौहार मनाया जाता है ।


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