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Langar BaBa की स्ट्रगल की दुःख भरी कहानी ।।

करीब पांच सताब्दी पहले गुरुनानक जी ने इस घरती में भूखे लोगो को खाना खिलाकर लंगर परम्परा के शुरुआत की थी । उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए पारिवारिक खुसी , धार्मिक ख़ुशी और अलग अलग कार्यो में लोगो ने अपने हाथ बताने शुरू किये । ये सेवा की भावना रखने वाले बाबा Langar BaBa की है जो चंडीगढ़ ( पंजाब ) में लोगो को लंगर दे रहे है आइये जानते है इसके बारे में :-

परिचय Langar BaBa 

Langar BaBa का जन्म पेशावर पाकिस्तान में जन्म सन 5 जनवरी 1935 को जन्म लिए जगदीश चंद्र आहूजा । परिवार में छोटी बहन , छोटे भाई और माता पिता के साथ रहते थे । 

भारत पाकिस्तान विभाजन  ( 1947 ) के में विभाजन के बाद पश्चिम पंजाब से हजारो शरणार्थी  पंजाब ( भारत ) अलग अलग रास्तो से पहुंचे थे । ये वो दौर था जब जब बहुत ही ज्यादा हिंसा और लूटपाट का समय था ऐसा कहा गया है । इसमें था एक परिवार आहूजा परिवार । आहूजा परिवार अपनी जमीन जायदाद को छोड़कर एक शुकुन भरी जिंदगी की तलाश में अपने पांच बच्चो के साथ पिता रमेश आहूजा  पाकिस्तान से भारत पटियाला के मालशा ( मंडी )  कसबे में शरण ली थी.

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उस समय जगदीश आहूजा उस समय 12 वर्ष के थे । इस समय बहुत ही गरीबी को नजदीक से देखा है । उस समय सभी धन जायदाद को छोड़कर मात्र 12 रुपया जेब में थे ।  

स्ट्रगल भरे दिन 

कैसे भी करके परिवार के पेट पालने के लिए रेलवे स्टेशन में उस समय पेट भरने के लिए जगदीश आहूजा जी ट्रैन में दाल बेचा करते थे । 1 रुपया के दाल सुबह , 1 रूपये की दाल को शाम को लेकर के 3 मिल दूर पैदल चलके दाल और मुंग फली को लेकर के आते थे । उस समय गरीबी इतना था की एक चपल ही नहीं ले सकते थे ।  उस समय बिना चप्पल के पैदल चलके काम किया करते थे ।  1 रुपया की मूंगफली , दाल को लाकर के रेलवे के डिब्बों में  ( छोटे पुड़िया बनाकर ) जाकर के बेचते थे । ( उस समय एक रूपये की कीमत आज के 1 हजार से भी ज्यादा कीमती था )।

बेचने के बाद बचे हुए पैसो से शाम के भोजन करते थे । यदि कभी मूंगफली, दाल के पुड़िया नहीं बिकते थे तो रात में खाली पेट सो जाया करते थे । आपने इक इंटरव्यू में बताया है की उस समय 2 से 2.25 रुपए में काम चला लेते थे । मजदूरी भी बहुत कम था 1.05 रूपये के दिहाड़ी के दिए जाते थे तब 5 परिवार छोटी बहन , छोटे भाई और माता-पिता के साथ पेट पालना मुश्किल काम था । एक टाइम रोटी खाते थे तो एक टाइम भूखे रहके इस समय को कैसे भी काटे थे । दो महीनो तक यंहा पर काम किये ।


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दो महीने काम करने के बाद में पटियाला आ गए यंहा पर आकर के बिना पैरो में चप्पल के गली , मुहल्ले और और कालोनी में जाकर के गोलिया बेचने के काम करते थे । शुबह निकलते थे रोटी खा के तो शाम को पैसे लेकर के घर जाते थे उस समय आपकी उम्र साढ़े बारह साल के थे ।

उस समय परिवार की स्थति ऐसी थी की पेट पाले या पढ़ाई करे और इस्क्को देखते हुए इसके पिता जी ने पड़े नहीं करवा पाई और बाबा जी पढ़ाई नै कर पाए ।

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उसके बाद यहाँ रहकर के कई काम करने शुरू भी कर दिए और लगभग पटियला में 20 साल की उम्र तक पेट और परिवार को चलाने के लिए अलग-अलग ( रेडी , आम , केले बेचने का )  कामों को करते रहे । इस बीच में कई उतर -चढ़ाव देखते हुए काम किए । यंहा पर कई काम रेडी, आम और केले बेचने के काम से अच्छे पैसे कमा लेते थे । उसके बाद पटियाला को छोड़कर के चंडीगढ़ चले आये ।

चंडीगढ़ में जिंदगी 

सन 1956 में 715 रूपये को साथ में लेकर के चंडीगड़ 21 साल के उम्र में आ गए । जब जगदीश आहूजा जी ( Langar BaBa ) जब चंडीगढ़ आये थे उस समय सरकार चंडीगढ़ को प्लॅसिटी के रूप में विकसित कर रहे थे । चंडीगढ़  में आने के बाद में पहले संतरे फिर केले के बेचने की शुरुआत की ।

उस समय वंहा के लोगो को केले पकाने नहीं आते थे तो कच्चे , अधपके केले को खाते थे । इसे देखकर के चंडीगढ़ में जगदीश आहूजा जी केले को पकाकर केले बेचने की शुरुआत की । उस समय चवन्नी पैसे , अठन्नी पैसे चलते थे । तो एक दर्जन केले को 1 रूपये में बेचा करते थे । जिससे थोड़ी आमदनी से गुजरा करते थे । ऐसेे करते करते थोड़े थोड़े आमदनी बढ़ती गयी ।


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गरीबी दूर 

इसके बाद में अपने छोटे भाई के साथ में मिलकर केले बेचने के धंधे को छोड़कर के रेडी लगाने शुरू की । रेडी के धंधे भी अच्छे चलने लगे जिससे अच्छे पैसे बढ़ने लगे तो काम भी बढ़ने लगे थे । अब धीरे धीरे काम बढ़ने से परिवार की स्थिति , खाने पिने की दिक्कत दूर होने लगे थे , दो समय के खाना आसानी के साथ होने लगे थे । इसके बाद सब्जी मंडी में थोक विक्रेता बने । लम्बे समय तक संघर्ष करने के बाद में गरीबी दूर कर लिए थे । अब पैसे आने के बाद में कई जगहों पर रेडी लगा के काम चलाते रहे ।

लंगर की शुरुआत 

जब मंडी में काम करते थे तो मंडी में छोटे छोटे बच्चे वंहा काम करते थे तो उन बच्चो को देखकर के सोचा करते थे इक दिन मई इन गरीब परिवार के लोगो के लिए कुछ न कुछ जरूर करूँगा । सन 2000 में आपने लंगर की शुरुआत की । लंगर खोलने के पहले ये नहीं पता था की सामान कंहा से खाना आएगा , कंहा से पैसा आएगा , कैसे , कंहा शुरू करेंगे ये नहीं पता था ।

अपनी पत्नी के हाथो से सबसे पहले लंगर की शुरुआत किया । लंगर के पहले दिन रोटी, चावल, छोले आलू आदि कम मात्रा में शुरुआत किया । पहली दिन सभी भोजन ख़त्म हो गए । दूसरे दिन उससे अधिक लोग लंगर लेने के लिए आये । ऐसे करते करते पहले रिक्से में लेकर के आते थे जब लंगर में लोगो की भीड़ लगने शुरू हुई थी ।

लगातार तीन सालो तक दाल चावल रोटी केले आदि देते रहे । बाद में 3 साल बाद में कम्बल , स्वेटर , बच्चो के लिए टॉफिया , बिस्कुट , आदि भी देने के शुरुआत की  । ये ऐसा लंगर था जो लगातार एक समय में दिया जाता है । इसमें किसी भी प्रकार के भेदभाव नहीं किया जाता । सभी धर्म के लोग यंहा एक साथ भोजन कर सकते थे ।

ऐसा लंगर था जंहा न त्यौहार देखे जाते थे , न दीपावली , न छुट्टी देखे जाते थे लगातार पुरे साल तक ये लंगर चलता रहता था । शुरुआत में लंगर में कम करने के लिए दो लोग ही कम करते थे लेकिन बाद में इनकी संख्या बढ़ाकर लोगो की सेवा करने में जुट गए ।


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सन 2009 में जगदीश चंद्र आहूजा को कैंसर हो गया था उसके बाद भी लोगो के लिए लंगर में अपना हाथ बताने के काम किया करते थे । साल के कुछ ही दिन रहे होने जो आपने लंगर में अपना हाथ नहीं बता पाए । कैंसर होने के बाद चंड़ीगर के PGI  हॉस्पिटल में ठीक होने के बाद वंहा भी लंगर देने की शुरुआत की ।

PGI  हॉस्पिटल में देश के कई राज्यों के मरीज जैसे पंजाब , हरियाणा , कश्मीर , राजिस्थान जैसे कई लोग यंहा इलाज के लिए आते है । कई लोग ऐसे है जो रात में फुटपात में सोते है लेकिन शाम के खाने के पैसे नहीं होते है । ऐसे लोगो के लिए ये लंगर इक वरदान के रूप में काम कर रहे । लोगो की सेवा कर रहे है , पुण्य के भागीदारी का काम कर रहे है । 

जगदीश चंद्र आहूजा की इस सेवा के कारन इसे प्रेम के साथ लंगर वाले बाबा के नाम से पुकारा जाने लगा तब से लेकर आज तक जगदीश चंद्र आहूजा को लोग Langar BaBa के नाम से पुकारते है और Langar BaBa के नाम से लोग जानने लगे है । देश दुनिया में Langar BaBa के नाम से प्रसिद्ध हो गए है । 

पद्मश्री सम्मान 

जगदीश चंद्र आहूजा (Langar BaBa) की सेवा को देखते हुए भारत सरकार ने लंगर बाबा  ( जगदीश चंद्र आहूजा ) को पद्मश्री अवार्ड से 26 जनवरी 2020 को सम्मानित किया गया । 

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