बुद्ध का जन्म | Mahatma Buddh Ka Janm | गौतम बुद्ध कौन हैं?

Mahatma Buddh Ka Janm कथा

हेलो दोस्तों आज की इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको भगवन गौतम बुद्धा के जन्म के बारे में जानकारी देने वाले है । यानि की पोस्ट ले माध्यम से भगवन गौतम बुद्ध के कुल , भगवन गौतम बुद्ध के पूर्वजो के बारे में और गौतम बुद्धा (mahatma buddh ka janm) के जन्म कब हुआ उनके बारे में भी जान्ने वाले है तो चलिए बिना किसी देरी के इस पोस्ट बुद्ध (gautam budh ka janm) की कहानी को शुरू करते है ।

बुध के कुल/जाति (Gautam Budh Ka Janm)

ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तर भारत उस समय सर्व प्रभुत्व संपन्न एक राज्य नहीं था। उस समय देश अनेक छोटे और बड़े राज्य में बटा हुआ था। इनमें से किसी-किसी राज्य पर एक राजा का अधिकार था, किसी-किसी पर एक राजा का अधिकार नहीं था।

जो राज्य किसी एक राजा के आधीन मैं आते थे उनकी संख्या 16 थी जो इस प्रकार है – अंग, मगध, काशी, कोसल, वजी, मल्ल, चेदी, वत्स, कुरु, पंचाल, मत्स्य, सौरसेन , असमक, अवंती, गंधार, तथा कंबोज था जो एक राजा के अधीन आता था।
और जिन राज्यों पर किसी एक राजा का आधिपत्य ना था वे थे कपिलवस्तु के शाक्य, पावा तथा कुशीनारा के मल्ल , वैशाली के लिच्छवि, मिथिला के विदेह, रामगाम के कोलिय, अल्लकप के बुली, केसपुत्त के कालम, कलिंग, पिप्पलवन के मौर्य , भग्ग जिसकी राजधानी सिसुमारगिरी था ।

जिन राज्यों पर किसी एक राजा का अधिकार था वे ‘जनपद‘ कहलाते थे और जिन राज्यों पर किसी एक राजा का अधिकार ना था वह ‘संघ’ या ‘गण’ कहलाते थे ।

कपिलवस्तु के शाक्य की शासन पद्धति के बारे में हमें विशेष जानकारी नहीं है। हम नहीं जानते कि वहां प्रजातंत्र का शासन था अथवा कुछ लोगों का शासन था। इतनी बात हम निश्चय पूर्व कह सकते हैं कि शाक्यो के जनतंत्र में कई राज्य परिवार थे और वे एक दूसरे के बाद क्रम से  शासन करते थे। राज्य परिवार का मुखिया राजा कहलाता था । सिद्धार्थ गौतम के जन्म के समय शुद्धोदन  की राजा बनने की पारी थी। शाक्य राज्य भारत के उत्तर पूर्व कोने में था वह एक स्वतंत्र राज्य था लेकिन आगे चलकर कोसल नरेश ने इसे अपने शासन क्षेत्र में शामिल कर लिया था ।

इस अधीराजिक प्रभाव क्षेत्र में रहने का परिणाम भी यह था कि कोसल नरेश की स्वीकृति के बिना शाक्य राज्य अपने स्वतंत्र रीति से अपने राजकीय अधिकार का उपयोग नहीं कर सकता था। उस समय के राज्यों में कौशल एक शक्तिशाली राज्य था। मगध राज्य भी ऐसा ही राज्य था। कोसल नरेश प्रसेनजीत और मगध के नरेश बिंबिसार सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के समकालीन थे।

गौतम बुद्ध के पूर्वज (Mahatma Buddh Ka Janm)

शाक्यो की राजधानी का नाम कपिलवस्तु था। हो सकता है कि इस नगर का नाम महान बुद्धिवादी मुनि कपिल के ही नाम पर पड़ा हो। कपिल वस्तु में जयसेन नाम का एक शाक्य रहता था। सिंहहनु उसका पुत्र था। सिंहहनु का विवाह कच्चाना से हुआ था । उसके 5 पुत्र थे जिनका नाम शुद्धोदन , धौतोधन, शुक्लोधन, शाक्योदन , तथा अमितोदन थे इसके अतिरिक्त सिंहहनु के दो पुत्रियां थी जिनका नाम अमिता और प्रमिता था । उसके परिवार के गोत्र का नाम आदित्य था।

सिंह हनु के बड़े बेटे शुद्धोदन का विवाह महामाया से हुआ था। महामाया का पिता का नाम अञजन था तथा उनकी माता का नाम सुलक्ष्णा देवी था। अञजन कोलिय था और वह देवदह नाम की बस्ती में रहता था।

शुद्धोदन क्षत्रिय होने के नाते बड़ा ही पराक्रमी योद्धा था। जब शुद्ध युद्ध में अपने वीरता का परिचय दिया तो उसे एक और विवाह करने की अनुमति मिल गई। इसके बाद उन्होंने महाप्रजापति को अपनी दूसरी पत्नी के रूप में चुना जो महाप्रजापति , महामाया की बड़ी बहन थी।

शुद्धोदन  बड़ा धनी आदमी था। उनके पास में बहुत बड़े-बड़े खेत थे और उनके पास में अनगिनत नौकर चाकर रहते थे। कहा जाता है कि अपने खेतों को जोतने के लिए उसे एक हजार हलचल वाने पड़ते थे। वह बड़े अमन चैन की जिंदगी व्यतीत करता था। उसके कई छोटे-बड़े महल जहां वह कभी-कभी निवास करते थे।

भगवान गौतम बुद्ध का जन्म 

शाक्य राज्य में रहने वाले लोग आषाढ़ के महीने में ए

भगवान गौतम बुद्ध का जन्म 
क महोत्सव मनाया करते थे। इस उत्सव में क्या राजा, क्या प्रजा सभी इस महोत्सव में सम्मिलित होते थे और घुलमिल करके इस महोत्सव को बड़े धूमधाम के साथ ,हर्ष उल्लास के साथ मनाते थे। यह महोत्सव समान रूप से 7 दिन तक मनाया जाता था।

एक बार महामाया ने इस उत्सव को बड़े ही आमोद-प्रमोद के साथ और सुगंधियो के साथ मनाने का निश्चय किया। उसने नशीली पदार्थों, नशीली वस्तुओं को बिना हाथ लगाए वह इस महोत्सव में सम्मिलित हुई थी।

महोत्सव के सातवें दिन प्रातः काल उठी। सुगंधित जल से स्नान किया। 4 लाख कर्षापणो का दान दिया। उसने अच्छे से अच्छे गहनें , अच्छे से अच्छे वस्त्र पहने, उन्होंने स्वादिष्ट भोजन अभी ग्रहण की। व्रत रखें उसके बाद में वह खूब सजे-सजाए शयनागर में सोने के लिए चली गई । उस रात शुद्धोदन और महामाया निकट हुए और महमाया ने गर्भधारण किया। राज्य की सैया पर पड़े पड़े उसे नींद आ गई और नींद में है महामाया ने एक सपना देखा।

स्वपन में उन्होंने देखा की चतुर्दिक महाराजिक देवता उसकी सैया को उठा ले गई और उन्होंने उसे हिमवंत प्रदेश में 1 साल वृक्ष के नीचे रख दिया है। वह देवता पास खड़े हैं। तब चातुरदिक महाराजिक देवताओं की देवियां वहां आई और उसे उठा कर के मानसरोवर ले गई। उन्होंने उसे स्नान कराया, उन्हें स्वच्छ वस्त्र पहनाएं और सुगंधी उसे लेप किया, और फूलों से ऐसा और इतना सजाया कि वह किसी दिव्य विभूति का स्वागत कर सके ।

तब सुमेध नामक एक बोधिसत्व उसके पास आया और उसे प्रश्न किया, मैंने अपना अंतिम समय पृथ्वी पर जन्म लेने का निश्चय किया है, क्या तुम मेरी माता बनना स्वीकार करोगी? उसका उत्तर था बड़ी प्रसन्नता से। और उस समय महामाया देवी की आंख खुल गई।

दूसरे दिन महामाया ने शुद्धोदन  से अपने इस स्वप्न की चर्चा की। उनके राजा ने इस सप्ताह की व्याख्या करने में असमर्थ थे तो उन्होंने स्वप्न विद्या में प्रसिद्ध 8 ब्राह्मणों को बुलाने के लिए भेजा। उन 8 ब्राह्मणों के नाम –  राम, ध्वज, लक्ष्मण, मंत्री, कोडञ्ज, भोज , सुयाम, और सूदत्त आदि ब्राह्मणों के नाम हैं । इन आठों ब्राह्मणों के स्वागत के लिए उनके योग्य अनुसार तैयारी की गई। उन ब्राह्मणों के लिए जमीन पर पुष्प वर्षा कराई और उनके लिए सम्मानित आसन भी बिछवाए । उसने ब्राह्मणों के पात्र सोने चांदी से भर दे और उन्हें मधु, घी, शक्कर बढ़िया चावल तथा दूध से पके पकवानों से समर्पित कर दिया।

जब ब्राह्मण खा पीकर के और राजा से उनकी सेवा सत्कार को देखकर प्रसन्न हो गए तब शुद्ध ने उन्हें महामाया का सपना को गाकर सुनाया और पूछा- मुझे इसका अर्थ समझाइए।
महाराजा के प्रश्न का उत्तर उन ब्राह्मणों ने कहां की-  महाराज आप निश्चित हो जाइए ! आपके यहां एक पुत्र का जन्म होगा। यदि वह पुत्र घर में रहेगा तो वह चक्रवर्ती राजा बनेगा , यदि वहां गृह त्याग कर सन्यासी होगा तो वह बुद्ध बनेगा और संसार के अंधकार का नाश करेगा ।

जिस प्रकार से पात्र में तेल धारण किए जाते हैं ठीक उसी तरह से महामाया बोधिसत्व को लगभग 10 महीने तक अपने गर्भ में धारण किए रही। समय समीप आया जान उसने अपने मायके जाने की इच्छा प्रकट की और अपने पति को संबोधित करते हुए उसने कहा- मैं अपने मायके देवदत्त आना चाहती हूं।

राजा शुद्धोदन  का उत्तर था – तुम्हारी इच्छा की पूर्ति जरूर होगी । कहारों के कंधों पर दो ही जाने वाले सुनहरी पालकी की में बिठाकर अनेक सेवक सेविकाओं के साथ शुद्धोदन  ने उन्हें सेवक सेविका ke साथ और कुछ सैनिकों के साथ उन्हें पालकी पर बैठा करके मायके भिजवा दिया। देवदह के मार्ग में एक साल वृक्ष के एक उद्यान वन से होकर के गुजारना पड़ता था। जहां साल वृक्ष लगे हुए थे। महामाया को इन्हीं साल वृक्ष के उद्यान से होकर गुजर ना था जिसमें से कुछ छाल के वृक्ष पुष्पित थे और कुल साल के भूले हुए नहीं थे। इस उद्यान को लुंबिनी वन कहलाता था या कहा जाता था।

जिस समय पालकी लुंबिनी वन में से होकर गुजर रही थी तब ऐसा प्रतीत होता था मानो सारा लुंबिनी वन दिव्य चित्रलता के समान अथवा किसी प्रताप दी राजा के स्वागत में बाजार को सुसज्जित किया गया हो। जड़ से वृक्षों की शाखाओं की छोड़ तक पेड़ फलों और फूलों से लदे हुए थे। नाम ना प्रकार के भ्रमर गुनगुन जान कर रहे थे। पंछी पेड़ों के शाखाओं में बैठकर चहचहा रहे थे। यह मनोरम दृश्य देखकर के महामाया के मन में इच्छा उत्पन्न हुई कि वह कुछ समय वहां रहे और क्रीड़ा करें। उसने अपने पालकी ढोने वालों को आज्ञा दी कि वह उसकी पालकी को उद्यान में ले चले और वही उनका वापस आने का इंतजार करें।

महामाया पालकी से उतरी और एक सुंदर साल वृक्ष की ओर आगे बढ़ी । हल्की हल्की हवाएं चल रही थी जिससे वृक्ष की शाखा ऊपर से नीचे हिलोर डोल रही थी ‌। महामाया ने उनमें से एक शाखा को पकड़ने को चाहा। लेकिन अचानक से एक शाखा काफी नीचे झुक गया। महामाया ने उस शाखा को पंजों के बल खड़े होकर उसे पकड़ लिया। तुरंत शाखा ऊपर की ओर बढ़ी और हल्का सा झटका लगने से महामाया को प्रसव वेदना शुरू हुई। उस साल वृक्ष की शाखा को पकड़े पकड़े, खड़े ही खड़े महामाया ने एक पुत्र को जन्म दिया।

563 ईसवी पूर्व वैशाख पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ गौतम बुद्ध (Mahatma Buddh Ka Janm)का जन्म हुआ।

शुद्धोदन और महामाया का विवाह हुए बहुत समय बीत गया था। लेकिन उन्हें कोई संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। आखिर जब पुत्र लाभ हुआ तो ना केवल शुद्ध धन खुश हुआ बल्कि उसके सारे परिवार द्वारा , शाक्य समुदाय के द्वारा पुत्र जन्म के उत्सव में बड़ी ही शान -बान और बड़े ही ठाठ-बाट के साथ अत्यंत प्रसन्ना ता पूर्वक इस जन्म उत्सव को मनाया गया ।

बालक के जन्म के समय अपनी बारी से शुद्ध धन पर कपिलवस्तु का शासन करने की जिम्मेदारी थी। तथा वह राजा कहलाया और इसलिए स्वाभाविक तौर पर उसका जो बालक है वह राजकुमार कहलाता है।


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FAQ

1 . गौतम बुद्ध कौन हैं ? (Mahatma Buddh Kaun The)
उत्तर – महात्मा गौतम बुद्धा के बचपन के नाम सिद्धार्थ है और Mahatma Buddh Kaun The तो गौतम बुद्ध के माँ महमाया और शुद्धोदन नजदीक हुए और महामाया की नींद में उन्हें “सुमेध” नाम के बोधिसत्व उनके गर्भ धारण की अतः कहा जा सकता है की Mahatma Buddh Kaun “सुमेध” नाम के बोधिसत्व थे जो भगवन गौतम बुद्ध के रूप में पृथ्वी में अपना जन्म Gautam Budh के रूप में लिया था ।

2 .  Gautam Buddh Ka janm Kahan Hua Tha ?
Gautam Buddh ka janm kahan hua देवदह के मार्ग में लुम्बनी वन में साल के शाखा को पकड़े-पकड़े हुआ था

3 .   Gautam Buddh Ka janm Kab Hua Tha ?
Gautam Buddh Ka janm Kahan Hua 563 ईसवी पूर्व वैशाख पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ गौतम बुद्ध (Mahatma Buddh Ka Janm)का जन्म हुआ था  .

4 . गौतम बुद्ध के गुरु का नाम (Gautam Budh Ke Guru Ka Naam)

जैसे की आप सभी लोगो को पता होगा की एक राजा के बेटे की परिवरिस उनके घर में ही होता है ठीक उसी तरह से गौतम बुद्ध के शिक्षा भी घर से ही पुरी हुई . गौतम बुद्ध के गुरु का नाम (Gautam Budh Ke Guru Ka Naam) वे आठो ब्राम्हण जो महमाया के स्वप्न की व्याख्या करने के लिए बुलाया गया था वे आठ ब्राम्हण ही इनके पहले आचार्य हुए जिनका नाम कुछ इस प्रकार से है :- राम, ध्वज, लक्ष्मण, मंत्री, कोडञ्ज, भोज , सुयाम, और सूदत्त आदि ब्राह्मणों के नाम हैं । GAUTAM बुद्ध ने महज 8 वर्ष की काम आयु में ही उन्हें वेद , वेदांत , उपनिषद आदि की शिक्षा दी ।

 5 . गौतम बुद्ध की पत्नी का नाम
गौतम बुद्ध की पत्नी का नाम यशोधरा थी जो दंडपाणि नाम के शाक्य की बेटी है जिन्हे स्वयं वर में भगवन गौतम बुद्ध को चुनी थी ।

6 . गौतम बुद्ध का जन्म कब हुआ था ?
गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसवी पूर्व वैशाख पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ गौतम बुद्ध (Mahatma Buddh Ka Janm)का जन्म हुआ था । 

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